Namo jinanam

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रोहिणी व्रत विधि एवं कथा(Rohini Vrat)

जंबूद्वीप के इसी भरत क्षेत्र में कुरुजांगल देश है, इसमें हस्तिनापुर नामक सुंदर नगर है। किसी समय यहां वीतशोक राजा राज्य करते थे। इनकी रानी का नाम विद्युत्प्रभा था।इन दोनों के एक अशोक नाम का पुत्र था। इसी समय अंग देश की चंपा नगरी में मघवा नाम के राजा राज्य करते थे, इनकी श्रीमती नाम की रानी थी। श्रीमती के आठ पुत्र और रोहिणी नामक एक कन्या थी। यौवन को प्राप्त हुई रोहिणी  ने एक समय अष्टाह्निका  पर्व में उपवास करके मंदिर में पूजा करके सभा भवन में बैठे हुए माता- पिता को  शेषाक्षत दिए। पिता ने पुत्री को युवती देखकर कुछ क्षण मंत्रशाला में मंत्रियों से मंत्रणा की, पुनः स्वयंवर की व्यवस्था की। स्वयंवर में रोहिणी ने हस्तिनापुर के राजकुमार के गले में वरमाला डाल दी।

 कालांतर में वीतशोक महाराज ने दीक्षा ले ली और अशोक महाराज बहुत न्यायनीति से राज्य का संचालन कर रहे थे। रोहिणी महारानी के आठ पुत्र और चार पुत्रियां थीं। किसी समय महाराज अशोक महारानी रोहिणी के साथ महल की छत पर बैठे हुए विनोद गोष्टी कर रहे थे। पास में बसंततिलका धाय बैठी हुई थी। जिसकी गोद में रोहिणी का छोटा बालक लोकपाल खेल रहा था। इसी समय रोहिणी ने देखा कि कुछ स्त्रियां गली में अपने बालों को बिखेरे हुए एक बालक  को लिए छाती, सिर और भुजाओं को कूटती- पीटती हुई चिल्ला- चिल्ला कर रो रही हैं। तब रोहिणी ने अपनी बसंततिलका  धात्री से कुतूहलवश पूछा- हे माता ! नृत्य कला में विशारद लोग सिग्नटक, भानी,छत्र, रास और दुंबिली इन पांच प्रकार के नाटकों का अभिनय करते हैं। भरत महाराज द्वारा प्रणीत इन पांच प्रकार के नाटकों के सिवाय  ये स्त्रियां सादिकुट्टन रूप इस कौन  से नृत्य का अभिनय कर रहीं हैं? इस नाटक में सात स्वर, भाषा और मूर्च्छनाओं  का भी पता नहीं चल रहा है। इस नाटक का नाम तो मुझे बताओ।
 रोहिणी के इस भोलेपन के प्रश्न को सुनकर धाय बोली- पुत्री! कुछ दु:खी स्त्रियां महान् शोक और दु:ख मना रही हैं।
 रोहिणी ने जब धात्री के मुख से "शोक' और "दु:ख' यह दो शब्द सुने, तब उसने पूछा-  माता! यह बताओ कि यह "शोक' और "दु:ख' क्या वस्तु है?
 तब धात्री ने रुष्ट होकर जवाब दिया- सुंदरि! क्या तुम्हें उन्माद हो रहा है? पांडित्य और ऐश्वर्य क्या ऐसा ही होता है? क्या रूप से पैदा हुआ गर्व यही है? जो कि तुम "शोक' और "दु:ख' को नहीं जानती हो और रुदन को नाटक- नाटक बक रही हो? क्या तुमने इसी क्षण जन्म लिया है?
 क्रोधपूर्ण बात सुनकर रोहिणी बोली- भद्रे! आप मेरे ऊपर क्रोध मत कीजिए। मैं गंधर्वविद्या, गणितविद्या, चित्र, अक्षर, स्वर और ६४ विज्ञानों तथा ७२ कलाओं को ही जानती हूं। मैंने आज तक इस प्रकार का कलागुण न देखा है और न मुझसे किसी ने कहा है। यह आज मेरे लिए अदृष्ट और अभूतपूर्व है इसलिए मैंने आपसे यह पूछा है। इसमें अहंकार और पांडित्य की कोई बात नहीं।
  पुनः धात्री बोली- वत्से! न  यह नाटक का प्रयोग है और न किसी संगीत भाषा का स्वर है किंतु किसी इष्ट बंधु की मृत्यु से  रोने वालों का जो दु:ख है, वही  शोक कहलाता है।
 धात्री की बात सुनकर रोहिणी पुनः बोली-भद्रे! यह ठीक है, परंतु मैं रोने का भी अर्थ नहीं जानती, सो उसे भी बताइए।
 रोहिणी के इस प्रश्न के पूरा होते ही राजा अशोक बोला- प्रिये! शोक से जो रुदन किया जाता है, उसका अर्थ में बतलाता हूं। इतना कहकर राजा ने लोकपाल कुमार को रोहिणी की गोद से लेकर देखते ही देखते राज भवन के शिखर से नीचे फेंक दिया।
 लोकपाल कुमार अशोक वृक्ष की चोटी पर गिरा, उसी समय नगर देवताओं ने आकर दिव्य सिंहासन पर उस बालक को बिठाया और क्षीरसागर से भरे हुए १०८ कलशों से उसका अभिषेक किया और उसे आभारणों से भूषित कर दिया। अशोक महाराज और रोहिणी ने जैसे ही नीचे नजर डाली तो बहुत ही विस्मित हुए। उस समय सभी लोगों ने इसे रोहिणी के पूर्वकृत पुण्य का ही फल समझा।
 हस्तिनापुर के बाहर अशोक वन में अतिभूतितिलक, महाभूतितिलक, विभूतितिलक और अंबरतिलक नामक चार जिनमंदिर क्रमश: चारों दिशाओं में थे। एक बार रूपकुंभऔर स्वर्णकुंभ नाम के दो चारणऋद्धिधारी मुनि विहार करते हुए हस्तिनापुर में आकर पूर्व दिशा के जिन मंदिर में ठहर गए। वनपाल द्वारा मुनि आगमन का समाचार ज्ञात होने पर परिजन और पुरजन सहित अशोक महाराज मुनिराज की वंदना के लिए वहां पहुंचे। वंदना भक्ति के अनंतर राजा ने प्रश्न किया कि हे भगवन्! मैंने और मेरी पत्नी रोहिणी ने पूर्व जन्म में कौन सा पुण्य विशेष किया है, सो कृपा कर बताइए।
 मुनिराज ने कहा- हे राजन्! इसी जम्बूद्वीप  के अंतर्गत भरत क्षेत्र में सौराष्ट्र देश है उसमें ऊर्जयंतगिरी के पश्चिम में एक गिरि नामक नगर है इस नगर के राजा का नाम भूपाल और रानी का नाम स्वरूपा था। राजा के एक गंगदत्त राजश्रेष्ठी था, जिसकी पत्नी का नाम सिंधुमती था, इसे अपने रूप का बहुत ही घमंड था। किसी समय राजा के साथ  वनक्रीड़ा के लिए जाते हुए गंग श्रीदत्त ने नगर में आहारार्थ प्रवेश करते हुए मासोपवासी  समाधिगुप्त मुनिराज को देखा और सिंधुमती से बोला- प्रिये! अपने घर की तरफ जाते हुए मुनिराज को आहार देकर तुम पीछे से आ जाना। सिंधुमती पति की आज्ञा से लौट आई किंतु मुनिराज के प्रति तीव्र क्रोध भावना हो जाने से उसने कड़वी तूमड़ी का आहार मुनि को दे दिया। मुनिराज ने हमेशा के लिए प्रत्याख्यान ग्रहण कर सल्लेखनापूर्वक शरीर का त्याग कर स्वर्ग पद को प्राप्त कर लिया।
 जब राजा वन के वापस लौट रहे थे कि विमान में स्थित कर मुनि को ले जाते हुए देखकर मृत्यु का कारण पूछा। तब किसी व्यक्ति ने सारी घटना राजा को सुना दी। उस समय राजा ने सिंधुमती का मस्तक मुंडवाकर उस पर पांच बेल बंधवाएं, गधे पर बैठाकर उसके अनर्थ की सूचना नगर में दिलाते हुए उसे बाहर निकाल दिया। उसके बाद उसे उदुंबर कुष्ठ हो गया और भयंकर वेदना से सातवें दिन ही मर कर २२ सागर पर्यंत आयु धारण कर छठे नरक में उत्पन्न हुई। यह पापिनी क्रम से सातों ही नरकों में भ्रमण करते हुए कदाचित् तिर्यंचगति में आकर दो बार कुत्तिया हुई, सूकरी, श्रृगाली, चुहिया, गोंच, हथिनी, गधी और गौणिका हुई। अनंतर इसी हस्तिनापुर के राजश्रेष्ठी धनमित्र की पत्नी धनमित्रा से पूतिगंधा पुत्री के रूप में जन्मी, दुर्गंधा के समान उसके शरीर से भयंकर दुर्गंधि आ रही थी जिससे कि उसके पास किसी का भी बैठना कठिन था।
 उसी शहर के वसुमित्र सेठ का एक श्रीषेण पुत्र था, जो सप्तव्यसनी था। एक दिन चोरी कर्म से कोतवाल के द्वारा पकड़ा जा कर शहर से बाहर निकाला जा रहा था। उस समय धनमित्र ने कहा कि- श्रीषेण! यदि तुम मेरी कन्या के साथ विवाह करना मंजूर करो तो मैं तुम्हें इस बंधन से मुक्त करा सकता हूं। उसके मंजूर करने पर सेठ ने उसे बंधन मुक्त कराकर उसके साथ अपनी दुर्गंधा कन्या का विवाह कर दिया, किंतु विवाह के बाद जैसे- तैसे एक रात दुर्गंधा के पास बिताकर मारे दुर्गंध के घबराकर वह श्रीषेण अन्यत्र भाग गया। बेचारी दुर्गंधा पुनः पिता के घर पर ही रहते हुए अपनी निंदा करते हुए दिन व्यतीत कर रही थी। एक दिन उसने सुव्रता  आर्यिका को अपने पितृगृह में आहार दिया। अनंतर पिहितास्रव नामक चारणमुनि अमितास्रव  मुनिराज के साथ वन में आए। वहां पर सभी श्रावकों ने गुरु वंदना कर के उपदेश सुना। पूतिगंधा ने भी गुरु का उपदेश सुनकर कुछ क्षण बाद प्रश्न किया- हे भगवन्! मैंने पूर्व जन्म में कौन सा पाप किया है जिससे मेरा शरीर महा दुर्गंधी युक्त है मुनिराज ने कहा- पुत्री! सुनो, तुमने सिंधुमती सेठानी की अवस्था में मुनिराज को कड़वी तुमङी का आहार दिया था। उसके फलस्वरुप बहुत काल तक नरक और तिर्यंचों के दु:ख भोगे हैं और अभी भी पाप के शेष रहने से यह स्थिति हुई है। सारी घटना सुनकर पूतिगंधा ने कहा- हे गुरुदेव! अब मुझे ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे पापों का क्षय हो। मुनिराज ने कहा- पुत्री! अब तुम सभी पापों से मुक्त होने के लिए रोहिणी व्रत करो।
            रोहिणी व्रत विधि
 जिस दिन चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में हो उस दिन चतुराहार त्यागकर उपवास करना चाहिए और श्रीवासुपूज्य जिनेंद्र और श्रीचंद्रप्रभ जिनेंद्र की पूजा करके उनका जाप करना चाहिए - "ऊं ह्लीं श्रीवासुपूज्यजिनेंद्राय नमः' और "ऊं ह्लीं श्रीचंद्रप्रभजिनेंद्राय नम:' यह रोहिणी नक्षत्र 27 दिन में आता है इस तरह 27 वें दिन उपवास करके हुए पांच वर्ष और नौ दिन में 67 उपवास हो जाते हैं, अनंतर उद्यापन में वासुपूज्य भगवान की महा पूजा कराके  रोहिणी व्रत संबंधी पुस्तक छपाकर और भी अन्य ग्रंथों का भी भव्य जीवो में वितरण करना चाहिए। ध्वजा, कलश, घंटा घंटिका,  दर्पण, स्वस्तिक  आदि से मंदिर को भूषित करके महापूजा के अनंतर चतुर्विध संघ को आहार आदि चार प्रकार का दान और आर्यिकायों के लिए वस्त्रदान देना चाहिए।
 इस तरह गुरु मुख से सुनकर विधिवत् व्रत ग्रहण कर पूतिगंधा ने उसका पालन किया। श्रावक व्रत पालन करते हुए अंत में समाधिपूर्वक मरण करके यह अच्युत नामक 16वें स्वर्ग में देवी हो गई वहां से च्युत होकर वह तुम्हारी वल्लभा रोहिणी हुई है। राजन् ! यह रोहिणी व्रत का ही महात्म्य है जो कि यह "शोक' और "दु:ख' को नहीं समझ पाई है अनंतर मुनिराज ने अशोक से कहा अब मैं तुम्हारी पूर्व जन्म सुनाता हूं तो एकाग्रचित्त होकर सुनो। कलिंग देश के निकट विंध्याचल पर्वत पर अशोक वन में स्तंबकारी और श्वेतकारी नाम के दो मदोंमत हाथी थे किसी एक  दिन नदी में जल के लिए घुसे और आपस में लड़ कर मर गए। बिलाव और चूहा हुए, पुनः सांप- नेवला और बाज- बगुला हुए पुनः दोनों ही कबूतर हुए। अनंतर कनकपुर के राजा सोमप्रभ के पुरोहित सोमूभूमि की पत्नी सोमिला के सोमशर्मा और सोमदत्त नाम के पुत्र हो गए।
 राजा सोमप्रभ ने सोमभूमि के मरने के बाद पुरोहित पद सोमदत्त नामक उनके छोटे पुत्र को दे दिया। किसी समय सोमदत्त को यह मालूम हुआ कि मेरा बड़ा भाई मेरी पत्नी के साथ दुराचार करता है तब उसमें विरक्त होकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली इधर राजा ने पुरोहित पद सोमशर्मा को दे दिया।
 एक बार सोमप्रभ राजा ने हाथी के लिए शकट देश  के अधिपति वसुपाल के साथ युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर दिया। उस समय सोमदत्त मुनि के दर्शन होने से सोमशर्मा ने कहा- महाराज! आपको अपशकुन हो गया है अतः इस मुनि को मारकर इसके खून को दशों दिशाओं में क्षेपण कर शांतिकर्म करना चाहिए। यह सुनकर राजा ने अपने कान दोनों हाथों से ढक लिए। तब विश्वसेन नामक निमित्तज्ञानी ने आकर बतलाया-राजन् ! आपको आज बहुत ही उत्तम शकुन हुआ है देखिए! यति, घोड़ा, हाथी, बैल, कुंभ ये चीजें प्रस्थान और प्रवेश में सिद्धिसूचक मानी गई है।
 राजन्! आप देखिए, प्रातः ही राजा वसुपाल त्रिलोकसुंदर हाथी लाकर आपको  भेंट करेगा। विश्वसेन के वचनों से राजा का मन शांत हो गया पुनः प्रातः काल स्वयं वसुपाल राजा ने आकर वह हाथी सहर्ष भेंट कर दिया।
 इधर सोमशर्मा ने पूर्व वैर के कारण रात्रि में सोमदत्त मुनि की हत्या कर दी। जब राजा को इस बात का पता चला तब पांच प्रकार के दंडों से दंडित किया। मुनि हत्या के पाप से सोमशर्मा को कुष्ठरोग  हो गया और वह मर कर सातवें नरक पहुंच गया।
 वहां से निकलकर महामत्स्य हुआ, छठे नरक गया, सिंह हुआ,पांचवें नरक गया, सर्प हुआ, चतुर्थ नरक गया, पक्षी हुआ, द्वितीय नरक गया बगुला हुआ, पुनः प्रथम नरक गया। वहां से निकलकर सिंहपुर के राजा सिंहसेन की रानी से पूतिगंध नामक महादुर्गंध शरीरधारी पुत्र हुआ।
 किसी समय विमलमदन जिनराज केवलज्ञान होने पर देवों में  आगमन को देखकर पूतिगंध मूर्छित हो गया। पुनः होश में आने पर उसे जातिस्मरण हो गया। वह पिता के साथ केवली भगवान का दर्शन करके मनुष्यों की सभा में बैठ गया। राजा ने पूतिगंध के पूर्व भव पूछे और पूर्वोक्त  प्रकार विशेष स्पष्टतया  जिनेंद्र की वाणी से अपने भवांतरों को सुनकर पूतिगंध ने कहा- प्रभो! अब मुझे दु:खों से छूटने के लिए कोई व्रतादि बतलाइए, तब भगवान ने उसे रोहिणी व्रत का उपदेश दिया। इस व्रत में तीन साल में 40 उपवास होते हैं और पांच वर्ष नव दिन में 67 उपवास होते हैं। अनंतर विधिवत् उद्यापन करना चाहिए।
 पूतिगंध राजकुमार के व्रत और अणुव्रत आदि के प्रभाव से उसी भव में सुगंध शरीर वाला हो गया अनंतर एक महीने में ही सल्लेखना विधि से मरण करके प्राणत नामक स्वर्ग में महर्द्धिक देव हो गया। वहां से च्युत होकर पूर्वविदेह में पुंडरीकिणी नगरी के विमलकीर्ति राजा की श्रीमती रानी से अर्ककीर्ति नाम का पुत्र हो गया। आगे जाकर अर्ककीर्ति ने महावैभव स्वरूप चक्रवर्ती के पद को प्राप्त किया, अमित सुखों का अनुभव करके विरक्त हो जैनेश्वरी दीक्षा ले ली ।अंत में मरणकर सोलहवें  स्वर्ग में देव पद को प्राप्त किया।  उस समय पूतिगंधा का जीव जो कि रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्वर्ग में देवी हुई थी, वह इस देव की प्रिय देवी हुई। वहां से च्युत होकर आप अशोक राजा हुए हैं।
 इस प्रकार मुनिराज के मुख से भवांतरों को सुनकर राजा- रानी अति प्रसन्न हुए और सभी पुत्र- पुत्रियों के भव पूछकर हर्षितमना अपने शहर वापस आ गए। एक समय श्वेत केश को देखकर विरक्त होकर राजा अशोक ने वासुपूज्य भगवान के समवशरण में जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और सात ऋद्धि से संपन्न हुए भगवान के गणधर हो गए। अनंतर मोक्ष को पधार गए। रोहिणी भी सुमति आर्यिका के समीप आर्यिका दीक्षा लेकर स्त्री पर्याय को छेद कर सोलहवें स्वर्ग में देव हो गई।
 इस प्रकार से रोहिणी व्रत का महात्म्य अचिंत्य है। इस व्रत में हर उपवास के दिन वासुपूज्य भगवान का अभिषेक करके पूजन करना चाहिए और पुनः यह जाप करना चाहिए-       ‌‌                       

    "ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्यजिनेंद्राय  नमः'        "ॐ ह्रीं श्रीचंद्रप्रभजिनेंद्राय नम:"

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षोडश कारण व्रत कथा एवं विधि (Solah karan Vrat)

मेघमाला और षोडशकारण व्रत दोनों ही समान है। दोनों का आरंभ भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से होता है परंतु षोडशकारण व्रत में इतनी विशेषता है कि इसमें पूर्ण अभिषेक अश्विन कृष्णा प्रतिपदा को होता है, ऐसा नियम है। कृष्ण पंचमी तो नाम से ही प्रसिद्ध है।
 जम्बूद्वीप संबंधी भरत क्षेत्र के मगध (बिहार) प्रांत में राजगृही नगर है। वहां के राजा हेमप्रभ और रानी विजयावती थी। इस राजा के यहां महाशर्मा नामक नौकर था और उसकी स्त्री का नाम प्रियंवदा था। इस प्रियंवदा के गर्भ से कालभैरवी नामक एक अत्यंत कुरूपी कन्या उत्पन्न हुई कि जिसे देखकर माता-पिता आदि सभी स्वजनों तक को घृणा  होती थी। एक दिन मतीसागर नामक चारणमुनि आकाशमार्ग से गमन करते हुए उसी नगर में आए, महाशर्मा ने अत्यंत भक्ति सहित श्री मुनि को पड़गाकर विधिपूर्वक आहार दिया और उनसे धर्मोपदेश सुना।
  पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर विनययुक्त हो  पूछा- हे नाथ! यह मेरी कालभैरवी नाम की कन्या किस पाप कर्म के उदय से ऐसी कुरूपी और कुलक्षणी उत्पन्न हुई है, सो कृपा कर कहिए? तब अवधिज्ञान के धारी श्री मुनिराज कहने लगे, वत्स ! सुनो-
 उज्जैनी नगरी में एक महिपाल नाम का राजा और उसकी वेगावती नाम की रानी थी। रानी से विशालाक्षी नाम की एक अत्यंत सुंदर रूपवान कन्या थी, जो कि बहुत रूपवान होने के कारण बहुत अभिमानिनी थी और इसी रूप के मद में उसने एक भी सद्गुण न सीखा। यथार्थ है- अहंकारी नरों को विद्या नहीं आती है।
 एक दिन यह वह कन्या अपनी चित्रसारी में बैठी हुई दर्पण में अपना मुख देख रही थी कि इतने में ज्ञानसूर्य नाम के महातपस्वी मुनिराज उसके घर से आहार लेकर बाहर निकले,सो इस अज्ञान कन्या ने रूप के मद से मुनि  को देखकर खिड़की से मुनि के ऊपर थूक दिया और बहुत हर्षित हुई।
 परंतु पृथ्वी के समान क्षमावान् मुनिराज तो अपनी नीची दृष्टि किए हुए ही चले गए। यह देखकर राजपुरोहित इस कन्या का उन्मत्तपना देख उस पर बहुत क्रोधित हुआ और तुरंत ही प्रासुक जल से मुनिराज का शरीर प्रक्षालन करके बहुत भक्ति से वैयावृत्य कर स्तुति की ।यह देखकर वह कन्या बहुत लज्जित हुई और अपने किए हुए नीच कृत्य पर पश्चाताप करके श्री मुनि के पास गई और नमस्कार करके अपने अपराध की क्षमा मांगी मुनिराज ने उसको धर्म लाभ कहकर उपदेश दिया पश्चात् वह कन्या वहां से मर कर तेरे घर यह कालभैरवी नाम की कन्या हुई है इसने जो पूर्व जन्म में मुनि की निंदा व उपसर्ग करके जो घोर पाप किया है उसी के फल से यह ऐसी कुरूपा हुई है क्योंकि पूर्व संचित कर्मों का फल भोगे बिना छुटकारा नहीं होता है इसलिए अब इसे समभावों से भोगना ही कर्तव्य है और आगे को ऐसे कर्म न बंधे ऐसा समीचीन उपाय करना योग्य है। अब पुनः वह महाशर्मा बोला- हे प्रभो! आप ही कृपा कर ऐसा उपाय बताइए कि जिससे यह कन्या अब इस दुःख से छूटकर सम्यक् सुखों को प्राप्त होवे  तब श्री मुनिराज बोले- वत्स! सुनो-
 संसार में मनुष्यों के लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं है तो भला यह कितना सा दुःख है? जिन धर्म के सेवन से तो अनादिकाल से लगे हुए जन्म मरण आदि दुःख भी छूटकर  सच्चे मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है और दु:खों से छूटने की तो बात ही क्या है ? वे तो सहज ही  में छूट जाते हैं। इसलिए यदि यह कन्या षोडशकारण भावना भावे और व्रत पाले, तो अल्पकाल में ही स्त्रीलिंग छेदकर मोक्ष सुख को पावेगी।तब वह महाशर्मा बोला- हे स्वामी! इस व्रत की कौन-कौन  भावनाएं और विधि क्या है? कृपा कर कहिए। तब मुनिराज ने इन जिज्ञासुओं को निम्न प्रकार षोडशकारण व्रत का स्वरूप और विधि बतलाइए।
 इन 16 भावनाओं को यदि केवली -श्रुतकेवली  के पादमूल के निकट अंतः करण से चिंतन की जाए तथा तदनुसार प्रवर्तन किया जाए तो इनका फल  तीर्थंकर नाम कर्म के आस्रव का कारण है। आचार्य महाराज व्रत की विधि कहते हैं- भादो, माघ और चैत्र वदी एकम से अश्विन फाल्गुन  और वैशाख वदी एकम तक  (एक वर्ष में तीन बार) पूरे एक-एक माह तक यह व्रत करना चाहिए।
 इन दिनों तेला- बेला आदि उपवास करें तथा नीरस या एक, दो, तीन आदि रस त्याग कर ऊनोदरपूर्वक अतिथि या दीन दुःखी नर या पशुओं  को भोजन आदि दान देकर एक भुक्त करें ।अंजन, मंजन वस्त्रालंकार विशेष धारण न करें, ब्रह्मचर्य रखे, नित्य षोडशकारण भावना भावे और यंत्र बनाकर पूजाभिषेक करें, त्रिकाल सामायिक करें और (ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धि- विनयसंपन्नता- शीलव्रतेष्वनतिचार-  अभिक्ष्णज्ञानोपयोग- संवेग- शक्तितस्त्याग- शक्तितस्तप- साधुसमाधि- वैयावृत्यकरण- अर्हद्भक्ति- आचार्यभक्ति- बहुश्रुतभक्ति- प्रवचनभक्ति- आवश्यकापारिहाणि- मार्गप्रभावना- प्रवचनवत्सल्यादि-  षोडशकारणेभ्यो नमः) इस महामंत्र का दिन में तीन बार 108 बार जाप करें। इस प्रकार इस व्रत को उत्कृष्टसोलह वर्ष और मध्यम पांच अथवा दो वर्ष और जघन्य एक वर्ष करके यथाशक्ति उद्यापन करें अर्थात् 16-16 उपकरण श्री मंदिर जी में भेंट दे और शास्त्र व विद्यादान करें शास्त्र भंडार खोलें, सरस्वती मंदिर बनावे, पवित्र जिनधर्म का उपदेश करें और करावें इत्यादि यदि द्रव्य खर्च करने की शक्ति  न हो  तो व्रत दुगना करें।
इस प्रकार ऋषिराज के मुख से व्रत की विधि सुनकर कालभैरवी नाम की उस ब्राह्मण कन्या ने षोडशकारण व्रत स्वीकार करके उत्कृष्ट रीति से पालन किया, भावना भायी और विधिपूर्वक उद्यापन किया, पीछे वह आयु के अंत में समाधिमरण द्वारा स्त्रीलिंग छेदकर सोलहवें स्वर्ग में देव हुई वहां से बाइस सागर आयु पूर्ण कर वह देव जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र संबंधी अमरावती देश के गंधर्व नगर में राजा श्रीमंदिर की रानी महादेवी के सीमंधर नाम का तीर्थंकर पुत्र हुआ  सो योग्य अवस्था को प्राप्त होकर राज्योचित सुख भोग जिनेश्वरी दीक्षा ली और घोर तपश्चरण कर केवलज्ञान प्राप्त करके बहुत जीवो को धर्मोपदेश दिया तथा आयु के अंत में समस्त अघाति कर्मों का  भी नाश कर निर्वाण पद प्राप्त किया।
 इस प्रकार इस व्रत को धारण करने से कालभैरवी नाम की ब्राह्मण कन्या ने सुर-नर भवों के सुखों को भोग कर अक्षय अविनाशी स्वाधीन मोक्षसुख को प्राप्त कर लिया, तो जो अन्य भव्यजीव  इस व्रत को पालन करेंगे उनको भी अवश्य ही उत्तम फल की प्राप्ति होवेगी।

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मेघमाला व्रत (Meghmala Vrat)

वत्सदेश के कौशांबीपुरी में जब राजा भूपाल राज्य करते थे तब वहां पर एक वत्सराज नाम का श्रेष्ठी और उसकी पद्मश्री नाम की सेठानी रहती थी। पूर्वकृत् अशुभ कर्म के उदय से उस सेठ के घर में दरिद्रता का वास रहा करता था इस पर भी इसके सोलह पुत्र और बारह कन्याएं थी।
 गरीबी की अवस्था में इतने बालकों का लालन- पालन करना और गृहस्थी का खर्च चलाना कैसा कठिन हो जाता है, इसका अनुभव उन्हीं को होता है जिन्हें कभी ऐसा प्रसंग आया हो या जिन्होंने अपने आसपास रहने वाले दीन- दु:खियों की ओर कभी अपनी दृष्टि डाली हो। परम स्नेह करने वाले माता-पिता ही ऐसे समय में अपने प्यारे बालकों को अनुचित और कठोर शब्दों से केवल संबोधन ही नहीं करने लगते हैं किंतु उन्हें बिना मूल्य या मूल्य में बैच तक देते हैं।
 प्राणों से प्यारी संतान कि जिसके लिए संसार के अनेकानेक मनुष्य लालायित रहते हैं और अनेक यंत्र- मंत्र आदि कराया करते हैं। हाय! उस दरिद्रावस्था में यह भी भाररूप हो पड़ती है। वत्सराज सेठ इसी चिंता में चिंतित रहता था।
 जब ये बालक क्षुधातुर होकर माता से भोजन मांगते तो माता कठोरता से कह देती- जाओ मरो, लंघन करो, चाहे भीख मांगो तुम्हारे लिए मैं कहां से भोजन दे दूं? यहां क्या रखा है जो दे दूं? सो वे नन्हे बालक है झिड़की खाकर जब पिताजी के पास जाते, तब वहां से निराशा ही पल्ले पड़ती। हाय! उस समय का करुण क्रंदन किसके ह्रदय को विदीर्ण नहीं कर देता है?
  एक दिन भाग्योदय से चारण ऋद्धिधारी मुनि वहां आए उन्हें देखकर वत्सराज सेठ ने भक्तिसहित पड़गाया और घर में जो रुखा सूखा भोजन शुद्धता से तैयार किया गया था, सो भक्ति सहित मुनिराज को दिया। मुनिराज उस भक्तिपूर्वक दिए हुए स्वाद सहित भोजन को लेकर वन की ओर चले गए, तत्पश्चात् सेठ भी भोजन करके जहां जी मुनिराज पधारे, वहां खोजते- खोजते पहुंचा और भक्तिपूर्वक वंदना करके बैठा। श्री गुरु ने  इसे सम्यक्त्वादि धर्म का उपदेश दिया।
 पश्चात् सेठ ने पूछा- हे दयानिधि ! मेरे दरिद्रता  का कारण क्या है? और अब यह कैसे दूर हो सकती है?
 तब श्री गुरु बोले- हे वत्स! सुनो, कौशल देश की अयोध्या नगरी में देवदत्त नामक सेठ की देवदत्ता नाम की सेठानी रहती थी। वह धन-धान्य और रूप- लावण्य से संयुक्त तो थी परंतु कृपण होने के कारण दान धर्म में धन लगाना तो दूर ही रहे किंतु उल्टा दूसरे का धन हरण करने को तत्पर रहती थी।
 एक दिन कहीं से एक ग्रहत्यागी ब्रह्मचारी जो अत्यंत हीन शरीर था, सो भोजन के निमित्त उसके घर आ गए, उसे देख सेठानी ने अनेक दुर्वचन कह कर निकाल दिया। वह कृपणा कहने लगी- अरे जा जा, यहां से निकल, यहां तो घर के बच्चे भूखों मर रहे हैं, फिर दान कहां से करें?  जो चाहे सो यहां ही चला आता है, इतने ही में उसका स्वामी सेठ भी वहां आ गया और उसने अपनी स्त्री की हां में हां मिला दी। निदान कुछेक दिनों में वही हुआ, जैसी मनसा वैसी दशा हो गई अर्थात् उसका सब धन चला गया और वे यथार्थ में भूखों मरने लगे। अति तीव्र  पाप का फल कभी- कभी प्रत्यक्ष ही दिख जाता है।
 वे सेठ- सेठानी आर्त ध्यान से मरे सो ब्राह्मण के घर भैंस के पुत्र पाडा- पाडी हुए। सो वहां भी भूख प्यास की वेदना से पीड़ित हो पानी पीने के लिए सरोवर में घुसे थे कि कीचड़ मैं फंस गए और जब तड़फड़ाकर मरणोनन्मुख हो रहे थे, उसी समय दयालु श्रावक में आकर उन्हें णमोकार मंत्र सुनाया और मिष्ट शब्दों से संबोधन दिया।सो वे पाडा- पाडी वहां से मर कर णमोकार मंत्र के प्रभाव से तुम मनुष्य भव को प्राप्त हुए, परंतु पूर्व संचित पाप कर्मों का शेषांश रह जाने से अब तक दरिद्रता ने तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ा है।
 हे वत्स! यह दान न देने और यति आदि महात्माओं से घृणा करने का फल है, इसलिए प्रत्येक गृहस्थ को सदैव यथाशक्ति दान धर्म में अवश्य ही प्रवर्तना चाहिए। अब तुम सत्यार्थ देव अर्हंत, गुरु निर्ग्रन्थ और दयामयी धर्म में श्रद्धान करो और श्रद्धापूर्वक मेघमाला व्रत का पालन करो तो सब प्रकार से इस लोक और परलोक संबंधी सुखों को प्राप्त होंगे
 व्रत विधि - यह व्रत भादो वदि प्रतिपदा से लेकर आश्विन वदि प्रतिपदा तक प्रतिवर्ष एक-एक  मास करके पांच वर्ष तक किया जाता है अर्थात् भादो वदि प्रतिपदा से अश्विन वदि प्रतिपदा तक (एक माह) श्रीजिनालय के आंगन में सिंहासन आदि स्थापन करें और उस पर श्री जिनबिम्ब स्थापित करके अभिषेक और पूजन नित्य प्रति करें, श्वेत वस्त्र पहनें, श्वेत ही चंदोवा बंधावें, मेघधारा के समान १००८ कलशों से  महाभिषेक करके पश्चात् पूजा करें। पंच परमेष्ठी की १०८ बार जाप करें पश्चात् संगीत पूर्वक जागरण भजन इत्यादि करें। भूमिशयन व ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। यथाशक्ति चारों प्रकार का दान देवें, हिंसादि पंच पापों का त्याग कर तथा एक मास पर्यंत ब्रह्मचर्यपूर्वक एक भुक्त उपवास, बेला, तेला आदि शक्ति प्रमाण करें। निरंतर षट् रसीव्रत पालें अर्थात् नित्य एक रस छोड़कर भोजन करें।
 इस प्रकार जब पांच वर्ष पूर्ण हो जावें तब शक्ति प्रमाण भाव सहित उद्यापन करें अर्थात् पांच जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा करावें, पांच महान ग्रंथ लिखावें, पांच प्रकार पकवान बनाकर श्रावकों के पांच घर देवें। पांच- पांच घंटा, झालर, चंदोवा, चमर, छत्र और अछार आदि उपकरण देवें। पांच श्रावकों को भोजन करावें, सरस्वती भवन बनावें, पाठशाला चलावें इत्यादि और अनेकों प्रभावना बढ़ाने वाले कार्य करें।
      इस प्रकार व्रत की विधि सुनकर सेठ सेठानी ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया, सो व्रत के प्रभाव से उनका सब दारिद्र्य दूर हो गया और वे स्त्री- पुरुष सुख से काल व्यतीत करते हुए आयु के अंत में सन्यासपूर्वक मरण कर दूसरे स्वर्ग में देव हुए, फिर वहां से चयकर वे पोदनपुर में विजयभद्र नाम के राजा और विजयावती नाम की रानी हुई, सो पूर्व पुण्य के प्रभाव से धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादि संपत्ति के अधिकारी हुए, आयु के अंतिम भाग (वृद्धावस्था) में दोनों राजा और रानी अपने पुत्र को राज्य का अधिकार देकर आप जैनेश्वरी दीक्षा ले तप करने लगे सो तप के प्रभाव से आयु पूर्ण कर  राजा तो सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिंद्र हुआ और रानी भी स्त्रीलिंग छेद कर सोलहवें स्वर्ग में महर्दिक देव हुई, वहां से चयकर वे दोनों प्राणी मोक्ष प्राप्त करेंगे।
 इस प्रकार मेघमाला व्रत के प्रभाव से देवदत्त और देवदत्ता नाम के कृपण सेठ और सेठानी भी मोक्ष पद पाएंगे यदि और नरनारी श्रद्धा सहित व्रत पालें तो अवश्य उत्तम फल पाएंगे।

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आष्टाह्निका व्रत विधि एवं कथा (Aashtahnik Vrat)

अष्टाह्निका व्रत कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मासों में शुक्ल पक्ष में अष्टमी से पूर्णिमा तक किया जाता है तिथि वृद्धि हो जाने पर एक अधिक करना पड़ता है व्रत के दिनों के मध्य में तिथि ह्रास होने पर एक दिन पहले से व्रत करना होता है, जैसे मध्य में तिथि ह्रास होने से सप्तमी को उपवास, अष्टमी को पारणा, नवमी को कांजी-छाछ, दशमी को ऊनोदर, एकादशी को उपवास,द्वादशी को पारणा, त्रयोदशी को नीरस, चतुर्दशी को उपवास एवं शक्ति होने पर पूर्णिमा का उपवास, शक्ति के अभाव में ऊनोदर तथा प्रतिपदा को पारणा करनी चाहिए। यह सरल एवं जघन्य विधि अष्टाह्निका व्रत की है। व्रत की उत्कृष्ट विधि यह है कि अष्टमी से षष्ठोपवास अर्थात् अष्टमी, नवमी का उपवास, दशमी को पारणा, एकादशी और द्वादशी को उपवास, त्रयोदशी को पारणा एवं चतुर्दशी और पूर्णिमा को उपवास और प्रतिपदा को पारणा करनी चाहिए।
 इस प्रकार बताई हुई विधि से जो व्रत नहीं करते हैं उनकी व्रत विधि दूषित हो जाती है और व्रत का फल नहीं मिलता।
 कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन  यह व्रत किया जाता है। सप्तमी के दिन व्रत की धारणा करनी होती है। प्रथम ही श्री जिनेंद्र भगवान का अभिषेक, पूजन संपन्न किया जाता है, पश्चात् गुरु के पास, यदि गुरु न हो तो जिनबिंब के सन्मुख  संकल्प लिया जाता है।
 सप्तमी तिथि से प्रतिपदा तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना आवश्यक होता है, भूमि पर शयन, सचित्त पदार्थों का त्याग, अष्टमी को उपवास, रात्रि को जागरण आदि क्रियाएं की जाती है।
 अष्टमी तिथि के दिन में नंदीश्वर द्वीप का मंडल मांडकर अष्ट द्रव्यों से पूजा की जाती है। पूजा- पाठ के अनंतर नंदीश्वर व्रत की कथा पढ़नी चाहिए। "ॐ ह्रीं नंदीश्वरसंज्ञाय नमः" इस मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। नवमी को    "ॐ  ह्रीं महाविभूतिसंज्ञाय नमः"  इस महामंत्र का जाप, दशमी को "ॐ ह्रीं त्रिलोकसारसंज्ञाय नमः"  मंत्र का जाप, एकादशी को   "ॐ ह्रीं चतुर्मुखसंज्ञाय नमः" मंत्र का जाप, द्वादशी को "ॐ ह्रीं पंचमहालक्षणसंज्ञाय नमः" मंत्र का जाप, त्रयोदशी को    " ह्रीं स्वर्गसोपानसंज्ञाय नमः"  मंत्र का जाप, चतुर्दशी को "ॐ ह्रीं सिद्धचक्राय नमः" मंत्र का जाप एवं पूर्णमासी को "ॐ ह्रीं इंद्रध्वजसंज्ञाय नमः" मंत्र का जाप करना चाहिए।
 व्रत का समुच्चय मंत्र - "ॐ ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपजिनालयस्थ जिनबिंबेभ्यो नमः"
व्रत की धारणा और समाप्ति के दिन णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।

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रविव्रत विधि एवं कथा (Ravi Vrat)

 रविव्रत में आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष में प्रथम रविवार पार्श्वनाथ संज्ञक होता है। इससे आरंभ कर नौ रविवार तक व्रत करना चाहिए। यह व्रत नौ वर्ष तक किया जाता है। प्रथम वर्ष में नौ रविवारों को उपवास, द्वित्तीय वर्ष में नौ रविवारों को एकाशन, तृतीय वर्ष में नौ रविवारों को कांजी- छाछ या छाछ  से बने महेरी आदि पदार्थ लेकर एकाशन, चतुर्थ वर्ष में नव रविवारों को बिना घी का रुख भोजन, पंचम वर्ष में नौ रविवारों को नीरस भोजन, षष्ठ वर्ष में नौ रविवारों को बिना नमक का अलोना भोजन, सप्तम वर्ष में नौ रविवारों को बिना दूध, दही और घृत भोजन, अष्टम वर्ष में नौ रविवारो को ऊनोदर एवं   नवम वर्ष में नौ रविवारों को बिना नमक के नौ ऊनोदर  किए जाते हैं। किस प्रकार 81 व्रत - दिन होते हैं। व्रत के दिन श्रीपार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक और पूजन किया जाता है।  जो विधिपूर्वक व्रत का पालन करते हैं, उनके गले में मोक्ष लक्ष्मी के गले का हार पड़ता है। व्रत पूरा होने पर उद्यापन करना चाहिए। रविव्रत की यह शास्त्रीय विधि है किंतु वर्तमान में पूरे 9 वर्ष तक इसमें मात्र अलोना भोजन का एकाशन  या उपवास करने की परंपरा भी दिगंबर जैन समाज में पाई जाती है।
                               "रविव्रत का फल"
 सुतं वन्ध्या समाप्नोति,
                         दरिद्रो लभते धनम्
 मूढः श्रुतमवाप्नोत,
                   रोगी मुञ्चति व्याधितः।।
 रविवार का व्रत करने से बंध्या स्त्री पुत्र प्राप्त करती है, दरिद्री व्यक्ति धन प्राप्त करता है, मूर्ख व्यक्ति शास्त्रज्ञान एवं रोगी व्यक्ति व्याधि से छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
                              "रविव्रत कथा"
 काशी देश की बनारस नगरी का राजा महिपाल अत्यंत प्रजावत्सल और न्यायी था। उसी नगर में मति सागर नाम का एक सेठ और गुणसुंदरी नाम की उसकी स्त्री थी। इस सेठ के पूर्व पुण्योदय से उत्तमोत्तम गुणवान तथा रूपवान  सात पुत्र उत्पन्न हुए।
 उनमें छः का तो विवाह हो गया था, केवल लघु पुत्र गुणधर कुंवारे थे,  सो गुणधर किसी दिन वन में क्रीड़ा करते विचर रहे थे तो उनको गुणसागर मुनि के दर्शन हो गए वहां मुनिराज का आगमन सुनकर और भी बहुत लोग वंदनार्थ वन में आए थे, वह सब स्तुति वंदना करके यह यथास्थान बैठे। श्री मुनिराज  उनको धर्मवृद्धि कहकर अहिंसादि धर्म का उपदेश करने लगे।
जब उपदेश हो चुका तब साहूकार की स्त्री गुणसुंदरी बोली- स्वामी! मुझे कोई व्रत दीजिए। तब मुनिराज ने उसे पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत का उपदेश दिया और सम्यक्त्व का स्वरूप समझाया और पीछे कहा बेटी- आदित्यवार का व्रत कर,सुन, इस व्रत की विधि इस प्रकार है कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में अंतिम रविवार से लेकर नव रविवारों  तक यह व्रत करना चाहिए।
 प्रत्येक रविवार के दिन उपवास करना या बिना नमक के अलोना भोजन एक बार करना, पार्श्वनाथ भगवान की पूजा अभिषेक करना। घर के सब आरंभ का त्याग कर विषय और कसाय भावों को दूर करना, ब्रह्मचर्य से रहना, रात्रि जागरण -भजनादि करना और 'ऊँ ह्रीं अर्हं श्रीपार्श्वनाथाय नमः' इस मंत्र की 108 बार जाप करना।
 नवधाभक्ति कर मुनिराज को भोजन कराना और नव वर्ष पूर्ण होने पर उद्यापन करना। नव- नव उपकरण मंदिरों में चढ़ाना, नव शास्त्र लिखवाना, नव श्रावकों को भोजन कराना, नव- नव  श्रावकों को बांटना, समवसरण का पाठ पढ़ना, पूजन विधान करना आदि।
 इस प्रकार गुणसुन्दरी व्रत लेकर घर आई और सब कथा घर के लोगों को कह सुनाई तो घरवालों ने सुनकर इस व्रत की बहुत निंदा की इसलिए उसी दिन से उस घर में दरिद्रता का वास हो गया। सब लोग भूखों मरने लगे, तब सेठ के सातों पुत्र सलाह करके परदेश को निकले। सो अयोध्या नगरी में जिनदत्त सेठ के घर जाकर नौकरी करने लगे और सेठ- सेठानी बनारस ही में रहे।
 कुछ काल के पश्चात् बनारस में कोई अवधिज्ञानी मुनि पधारें, सो दरिद्रता से पीड़ित सेठ- सेठानी भी वंदना को गए और दीन भाव से पूछने लगे- हे नाथ! क्या कारण है कि हम लोग ऐसे रंक हो गए? तब मुनिराज ने कहा- तुमने मुनि प्रदत्त रविवार व्रत की निंदा की है इससे यह दशा हुई है।
 यदि तुम पुनः श्रद्धा सहित इस व्रत को करो तो तुम्हारी खोई हुई संपत्ति तुम्हें फिर मिलेगी।सेठ- सेठानी ने मुनि को नमस्कार करके पुनः रविवार व्रत किया और श्रद्धा सहित पालन किया जिससे उनको फिर से धन-धान्य आदि की अच्छी प्राप्ति होने लगी, परंतु इनके सातों पुत्र साकेतपुरी में कठिन मजदूरी करके पेट पालते थे तब एक दिन लघु भ्राता गुणधर वन में घास काटने को गया था,  सो शीघ्रता से गट्ठा बांधकर घर चला आया और हंसियां वहीं भूल आया। घर आकर उसने भावज से भोजन मांगा। तब वह बोली-
 लालजी! तुम हंसिया भूल आए हो, सो जल्दी जाकर ले आओ पीछे भोजन करना, अन्यथा हंसिया कोई ले जाएगा तो सब काम अटक जाएगा। बिना द्रव्य नया हंसिया कैसे आएगा? यह सुनकर गुणधर तुरंत ही पुनः वन में गया तो देखा कि हंसिया पर बड़ा भारी सांप लिपट रहा है।
 यह देखकर वह बहुत ही दुःखी हुआ कि हंसिया बिना लिए तो भोजन नहीं मिलेगा और हंसिया मिलना कठिन हो गया है तब वह विनीत भाव से सर्वज्ञ वीतराग प्रभु की स्तुति करने लगा सो उसके एकाग्रचित होकर स्तुति करने के कारण धरणेंद्र का आसन हिला, उसने समझा कि अमुक स्थानों में पार्श्वनाथ जिनेंद्र के भक्त को कष्ट हो रहा है, तब करुणा करके पद्मावती देवी को आज्ञा की कि तुम जाकर प्रभु भक्त गुणधर का दुःख निवारण करो। यह सुनकर पद्मावती देवी तुरंत वहां पहुंची और गुणधर से बोली -
हे पुत्र ! तुम  भय मत करो। यह सोने का हंसिया  और रत्न का हार तथा रत्नमई पार्श्वनाथ प्रभु का बिंब भी ले जाओ, भक्ति भाव से पूजा करना, इससे तुम्हारा दुःख शोक दूर होगा। गुणधर, देवी द्वारा प्रदत्त द्रव्य और जिन बिंब लेकर घर आया तो प्रथम तो उसके भाई यह देखकर डरे कि कहीं यह चुराकर तो नहीं लाया है क्योंकि ऐसा कौन सा पाप है जो भूखा नहीं करता है, परंतु पीछे गुणधर के मुख से सब वृतांत सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और भूरी भूरी प्रशंसा करने लगे।
 इस प्रकार दिनों- दिन उनका कष्ट दूर होने लगा और थोड़े ही दिनों में  वे  बहुत धनी हो गए। पश्चात् उन्होंने एक बड़ा मंदिर बनवाया, प्रतिष्ठा कराई, चतुर्विध संघ को चारों प्रकार का यथायोग्य दान दिया और बड़ी प्रभावना की।
 जब यह सब वार्ता राजा ने सुनी, तब उन्होंने गुणधर को बुलाकर सब वृतांत पूछा और अत्यंत प्रसन्न हो अपनी परम सुंदरी कन्या गुणधर को ब्याह दी तथा बहुत सा दान दहेज दिया। इस प्रकार बहुत वर्षों तक वे सातों भाई राज्यमान्य होकर सानंद वही रहे, पश्चात् माता-पिता का स्मरण करके अपने घर आए और माता-पिता से मिले, पश्चात् बहुत काल तक मनुष्योचित सुख भोग कर सन्यासपूर्वक मरणकर यथायोग्य स्वर्गादि गति को प्राप्त हुए और गुणधर उससे तीसरे भव में मोक्ष गए।
 इस प्रकार व्रत के प्रभाव से मतिसागर सेठ का दरिद्र दूर हुआ और उत्तमोत्तम सुख भोग कर उत्तम- उत्तम गतियां को प्राप्त हुए, जो भव्य जीव श्रद्धा सहित नौ वर्ष विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करेंगे, वे उत्तम गति पाएंगे।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री