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Syadwad-Anekantwad

स्याद्वाद अनेकांतवाद जानने और कहने में बहुत भारी अंतर है क्योंकि जितना जाना जा सकता है उतना कहा नहीं जा सकता। इसका कारण यह है कि ज्ञान के जितने अंश हैं उन ज्ञान अंशों के वाचक न तो उतने शब्द ही हैं और ना ही उन सब ज्ञान अंशों को कह डालने की शक्ति वाणी में है। सामान्य दृष्टांत है कि हम अंगूर ,आम, अनार खाकर उनकी मिठास के अंतर को यथार्थत: पृथक पृथक नहीं कह सकते। किसी भी इष्ट या अनिष्ट पदार्थ के छूने, सूंघने, देखने ,सुनने में जो आनंद या दु:ख होता है, कोई भी मनुष्य उस इंद्रिय जन्य ज्ञान को ठीक उसी रूप में मुख द्वारा कह नहीं सकता।परीक्षा में पास होने वाले विद्यार्थी को अपना परीक्षा फल जानकर जो हर्ष हुआ उसको हजार यत्न करने पर भी वह ज्यों का त्यों कह नहीं सकता। इस तरह एक तो जानने और कहने में यह एक बड़ा भारी अंतर है। दूसरे जितना विषय एक समय में जाना जाता है यदि उसे स्थूल रूप से भी कहना चाहें तो उसके कहने में जानने की अपेक्षा बहुत अधिक समय लगता है। किसी सुंदर उद्यान का एक दृश्य देखकर उस बगीचे के विषय में एक ही मिनट में जो ज्ञान हुआ, उस सबको कहने में अनेक मिनट की नहीं अपितु अनेक घंटे लग जाएंगे, क्योंकि जिन सब बातों को नेत्रों ने 1 मिनट में जान लिया है, उनको वाणी युगपत (एक साथ) कह नहीं सकती। उन बातों को क्रम से एक-एक करके कहाँ जा सकेगा। इसी कारण प्राचीन ग्रंथकारों ने लिखा है कि सर्वज्ञ अपने ज्ञान द्वारा पदार्थों को युगपत जितना जानते हैं उसका अनंतवां भाग उनकी वाणी से प्रकट होता है। जितना दिव्यध्वनि से प्रकट होता है उसका अनंतवां भाग चार ज्ञान धारक गणधर अपने हृदय में धारण कर पाते हैं। वह जितना विषय धारण कर पाते हैं तथा उसका अनंतवां भाग शास्त्रों में लिखा जाता है। इस प्रकार जानने और उस जाने हुए विषय को कहने में बहुत अंतर है। एक साथ जानी हुई बात को ठीक उसी रूप में एक साथ कहना असंभव है अतः जिस पदार्थ के विषय में कुछ कहा जाता है तो एक समय में उसकी एक ही बात कही जाती है, उस समय उसकी अन्य बातें कहने से छूट जाती हैं किंतु अन्य बातें उसमें होती अवश्य हैं जैसे कि जब यह कहा जाए कि राम राजा दशरथ के पुत्र थे उस समय राम के साथ लगे हुए सीता ,लक्ष्मण, लव- कुश आदि अन्य व्यक्तियों के पति, भ्राता-पिता आदि के संबंध कहने से छूट जाते हैं, जो कि यथार्थ है। यदि उन छूटे हुए संबंधों को सर्वथा छोड़ दिया जाए तो राम संबंधी जानकारी अधूरी रह जाएगी और इसी कारण वह कहना गलत साबित होगा। इस गलती या अधूरापन को हटाने के लिए जैन ज्ञान- मीमांसा ने प्रत्येक वाक्य के साथ स्यात शब्द लगाने का निर्णय दिया है। स्यात् शब्द का अर्थ कथनचित् अर्थात्किसी दृष्टिकोण से या किसी अपेक्षा से अर्थात् जो बात कही जा रही है, वह किसी एक अपेक्षा से , किसी एक दृष्टिकोण से कहीं जा रही है जिसका अभिप्राय यह प्रकट होता है कि यह विषय अन्य दृष्टिकोणों से या अन्य अपेक्षाओं से अन्य अनेक प्रकार भी कहा जा सकता है। तदनुसार राम के विषय में यों कहेंगे- स्यात् -(राजा दशरथ की अपेक्षा) राम पुत्र हैं। स्यात् - (सीता की अपेक्षा) राम पति है। स्यात्- (लक्ष्मण की अपेक्षा) राम भाई है। स्यात् - (लवण और अंकुश की अपेक्षा) राम पिता है। स्यात् - (राजा जनक की अपेक्षा) राम दामाद है। इस तरह स्यात् शब्द लगाने से उस बड़ी भारी त्रुटि, जो उपर्युक्त 5 बातों में से एक ही बात कहने पर होती है, का सम्यक् परिहार हो जाता है अर्थात् राम पुत्र तो है किंतु वह सर्वथा पुत्र ही नहीं है, वे पति, भाई, पिता, दामाद आदि भी तो हैं। हां, वे राजा दशरथ की अपेक्षा से पुत्र ही हैं, इस अपेक्षा शब्द से उसके अन्य दूसरे पति, भाई, पिता, दामाद आदि संबंध सुरक्षित रहते हैं। स्यात् भारत (हिमालय की अपेक्षा) दक्षिण में है। इससे यही ध्वनि निकलती है कि भारत देश सर्वथा दक्षिण में ही नहीं है अपितु अन्य दृष्टिकोण से अन्य दिशाओं में भी है। तदनुसार- स्यात् (पर्याय की अपेक्षा- मनुष्य, पशु आदि नश्वर शरीरों की दृष्टि से) जीव अनित्य है इस सत्य बात की भी रक्षा हो जाती है। इस प्रकार स्यात् निपात के संयोग से सभी सैद्धांतिक व व्यवहारिक विवाद शांत हो जाते हैं और पूर्ण सत्य का ज्ञान हो जाता है। किसी भवन के चारों ओर खड़े होकर चार फोटोग्राफर यदि उस भवन के फोटो लें तो उस ही भवन के चारों फोटो चार विभिन्न तरह के होंगे। यदि यह चारों अपने - अपने फोटो को ठीक बताकर परस्पर झगड़ने लगें कि मेरा फोटो ठीक है, तुम तीनों के फोटो गलत हैं तो उस विवाद का यथार्थ तथा चारों फोटोग्राफरों के लिए संतोषजनक निर्णय स्यात् कोई एक (इष्ट) दृष्टिकोण कर सकता है। तदनुसार निर्णय दिया जाएगा कि स्यात् (सामने की अपेक्षा) इस (भवन के सामने खड़े होकर खींचने वाले) फोटोग्राफर का फोटो ठीक है। स्यात् (पीछे भाग की अपेक्षा) पीछे से फोटो लेने वाले फोटोग्राफर का फोटो ठीक है। स्यात् (दाहिनी ओर की अपेक्षा) दाहिनी ओर से फोटो लेने वाले फोटोग्राफर का फोटो ठीक है। स्यात् (बायीं और की अपेक्षा) बाई ओर से फोटो लेने वाले फोटोग्राफर का फोटो ठीक है। इस तरह सबका संतोषजनक यथार्थ निर्णय स्यात् लगाने से हो जाता है। जगत के विभिन्न मत- मतांतर अपने- अपने एक- एक दृष्टिकोण को ही सत्य मानकर दूसरों के दृष्टिकोण से प्रकट की गई मान्यता को असत्य बतलाकर परस्पर विवाद करते हैं। उनका विवाद स्यात् पद लगाकर दूर किया जा सकता है। स्याद्वाद एक वास्तविक अकाट्य सिद्धांत है; किंतु यह दार्शनिक तर्क का विषय है , अतः कुछ कठिन है। अनेक व्यक्ति इसका स्वरूप ठीक ना समझ सकने के कारण इसे गलत ठहराने का यत्न करते हैं। ऐसी त्रुटि साधारण व्यक्ति ही नहीं, बड़े-बड़े विद्वान भी कर जाते हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संसार की प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मों का पुंज होती है। सच तो यह है कि वस्तु के एक धर्म को जान लेने से संपूर्ण वस्तु नहीं जानी जाती है; किंतु सामान्यतया व्यक्ति वस्तु के एक धर्म को जानकर उसे ही पूरी वस्तु का धर्म मानकर व्यवहार करने लग जाता है। अन्य धर्मों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता। वह अन्य धर्मों के प्रति अंधा बना रहता है। इसी बात को हाथी के दृष्टांत से समझाया जा सकता है- छह जन्मांध व्यक्ति एक हाथी के पास पहुँचते हैं। वे हाथी को छूते हैं। एक के हाथ में पूँछ आई तो एक के हाथ में सूंड, किसी ने कान पकड़ा तो किसी ने दांत, एक ने पैर और एक ने पेट पकड़ा। जब वे मिलकर हाथी के स्वरूप की चर्चा करने लगे तो सबके विचार अलग-अलग थे। जिसने हाथी के दांत पकड़े वह हाथी को भाले जैसा कहने लगा, जिसने हाथी की पूंछ पकड़ी वह हाथी को रस्सी जैसा मानने लगा, जिसने हाथी के पैर पकड़े वह हाथी को खंभे जैसा कहने लगा, जिसने हाथी का कान पकड़ा था वह हाथी को सूप जैसा बताने लगा, जिसने हाथी की सूंड पकड़ी वह हाथी को केले के पेड़ जैसा कहने लगा, जिसने हाथी का पेट पकड़ा वह उसे दीवार जैसा बताने लगा। इस तरह हाथी के विषय में छह भिन्न- भिन्न बातें सामने आईं। विवाद छिड़ गया क्योंकि अंधे होने के कारण वे हाथी के दूसरे (पूरे) रूप को नहीं देख सकते थे। इस तरह से वे सब एकांतवादी हो गए और अपनी- अपनी बात का आग्रह करने लगे। वे सब मिलकर मुनिराज के पास गए। मुनिराज ने उन्हें समझाया कि तुम सब एक दूसरे की दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करो- हाथी दांत की दृष्टि से भाले जैसा है, पूछ की दृष्टि से रस्सी जैसा भी है , पैर की दृष्टि से खंभे जैसा भी है, कान की दृष्टि से सूप जैसा भी है, सूंड की दृष्टि से हाथी केले के पेड़ जैसा भी है तथा पेट की दृष्टि से हाथी दीवार जैसा भी है। अंधे होने के कारण आप लोग वस्तु के दूसरे धर्मों को नहीं देख सके अतः विवाद छिड़ गया। आप सभी आंशिक रूप से सही हैं। सब दृष्टिओं को मिलाने से हाथी का पूरा स्वरूप समझा जा सकता है। यहाँ हाथी को अनेक दृश्यों से देखा गया है, यह अनेकांतवाद है हमें कहना चाहिए- 1: स्यात् हाथी खंभे जैसा है, 2: स्यात् हाथी भाले जैसा है, 3: स्यात् हाथी सूप जैसा है, 4: स्यात् हाथी दीवार जैसा है,5: स्यात् हाथी रस्सी से जैसा है और 6: स्यात् हाथी केले के पेड़ जैसा है। इस तरह स्याद्वाद हाथी के स्वरूप के विवाद को शांत कर देता है। यह कहना उचित है कि स्याद्वाद पदार्थ के सत्य स्वरूप को प्रकट कर देता है और अनेकांतवाद पदार्थ के स्वरूप को जान लेता है। यह दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री