Namo jinanam

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श्री अजितनाथ विधान (Ajitnath Vidhan)

प्रस्तुत कृति आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित क्षेत्र बटेश्वर के अजितेश्वर का पूजन-विधान है। 62 अर्घ वाला ये विधान भव्य जीवों को विघ्न, रोगों, विकारों और कर्मों से विजय दिलाने में समर्थ है और प्रशस्त मनोरथ पूरक है।

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श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ विधान(Kalkund Parshvanath Vidhan)

परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज ने भगवान् श्री पार्श्वनाथ की पूजा और विशिष्ट अर्घों के साथ 4 वलयों के द्वारा यह विधान लिखा है। कलिकुंड का अर्थ सर्वकलेश, कलह समूह का नाश करने वाला है। प्रस्तुत पुस्तक भव्य जीवों के चित्त को आह्लादित और विशुद्ध करने का मंगलमय साधन है।

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श्री सर्वतोभद्र महार्चना(sarvatobhadra mahaarchana)

इस भक्ति के महोदधि स्वरूप "सर्वतोभद्र महार्चना" की रचना  आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा केवल 15 दिन में  चातुर्मास के दौरान तारंगा जी सिद्ध क्षेत्र में की गई। 92 छंदों में निबद्ध इस महार्चना में 84 पूजा, 1902 अर्घ्य और 86 पूर्ण अर्घ्य हैं। विधान में 3 लोक के समस्त चैत्य, चैत्यालयों की भक्ति के साथ इसमें सिद्धांत भी दृष्टिगोचर होता है।यह विधान बहुत चमत्कारी है। इसे विशेष पर्व, दिन आदि में करना ही चाहिए।

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श्री मुनिसुव्रतनाथ विधान

पाप कर्मों की निर्जरा और पुण्याश्रव के लिए आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित ये "श्री मुनिसुव्रतनाथ विधान" 4 वलय और उनमें क्रम से 4,8,16 और 32 अर्घ्य सहित है।

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श्री सुविधिनाथ विधान

4 वलय और उनमें क्रम से 4, 8,16 और 32 अर्घ्यों वाला ये "श्री सुविधिनाथ विधान" आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित है जिसमें 9वें तीर्थंकर श्री पुष्पदंत अपर नाम श्री सुविधिनाथ भगवान की अर्चना है जो सब पापों को क्षय करने में समर्थ है।

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श्री वर्धमान महावीर विधान

प्रस्तुत "श्री वर्धमान महावीर विधान" आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा लिखित है, जो सब विघ्नों का नाश करने वाला है। इसमें 3 कोट हैं। क्रम से कोटों में 4, 8 और 54 अर्घ्य हैं।

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चंद्रप्रभ विधान (Chandra prabhu vidhan)

परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत "चन्द्रप्रभ विधान" श्रद्धा शिरोमणि श्री चन्द्रप्रभ भगवान के मूलगुणों की स्तुति हेतु रचा गया है। इस विधान में कुल 128 अर्घ्य हैं। प्रस्तुत कृति भव्य श्रावकों के सर्व मनोरथों को पूर्ण करने वाली है, भव दुःखों का अंत करने में समर्थ है। इस विधान में 8 वलय हैं, जिसमें पांच कल्याणकों के, सोलह स्वप्नों के फलों के, चौंतीस अतिशयों के, मुनिराज के 28 मूलगुणों के, बारह तप, दस धर्म व तीन गुप्तियों के, अष्ट प्रातिहार्य, अनंत चतुष्टय के व सिद्धों के अष्ट मूलगुणों के अर्घ हैं। यह विधान श्रावकों के लिए विधेय है।

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याग मंडल विधान एवं पंचकल्याणक पूजा (yag mandal vidhan aur panchkalyanak Pooja)

प्रस्तुत कृति "यागमंडल विधान एवं पंचकल्याणक पूजा" में परम पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज की लेखनी से प्रसूत भक्ति से समन्वित अद्भुत रचना है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, वेदी प्रतिष्ठा, कलशारोहण, दीक्षा आदि कार्यों में इस विधान को ही संपन्न किया जाता है।
 इस विधान में शब्दों का निर्माण, छंद आदि लयबद्ध तरीके से सरल, सहज अर्थपूर्ण ढंग से किया गया है, जिसे पढ़कर भव्य प्राणी सहज भक्ति सागर में सराबोर हो जाते हैं। सभी सातिशय पुण्यार्जन करें इसी अभिलाषा से प्रस्‍तुत कृति का प्रकाशन किया गया है।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री