

श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ विधान(Kalkund Parshvanath Vidhan)
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज ने भगवान् श्री पार्श्वनाथ की पूजा और विशिष्ट अर्घों के साथ 4 वलयों के द्वारा यह विधान लिखा है। कलिकुंड का अर्थ सर्वकलेश, कलह समूह का नाश करने वाला है। प्रस्तुत पुस्तक भव्य जीवों के चित्त को आह्लादित और विशुद्ध करने का मंगलमय साधन है।

श्री सर्वतोभद्र महार्चना(sarvatobhadra mahaarchana)
इस भक्ति के महोदधि स्वरूप "सर्वतोभद्र महार्चना" की रचना आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा केवल 15 दिन में चातुर्मास के दौरान तारंगा जी सिद्ध क्षेत्र में की गई। 92 छंदों में निबद्ध इस महार्चना में 84 पूजा, 1902 अर्घ्य और 86 पूर्ण अर्घ्य हैं। विधान में 3 लोक के समस्त चैत्य, चैत्यालयों की भक्ति के साथ इसमें सिद्धांत भी दृष्टिगोचर होता है।यह विधान बहुत चमत्कारी है। इसे विशेष पर्व, दिन आदि में करना ही चाहिए।




चंद्रप्रभ विधान (Chandra prabhu vidhan)
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत "चन्द्रप्रभ विधान" श्रद्धा शिरोमणि श्री चन्द्रप्रभ भगवान के मूलगुणों की स्तुति हेतु रचा गया है। इस विधान में कुल 128 अर्घ्य हैं। प्रस्तुत कृति भव्य श्रावकों के सर्व मनोरथों को पूर्ण करने वाली है, भव दुःखों का अंत करने में समर्थ है। इस विधान में 8 वलय हैं, जिसमें पांच कल्याणकों के, सोलह स्वप्नों के फलों के, चौंतीस अतिशयों के, मुनिराज के 28 मूलगुणों के, बारह तप, दस धर्म व तीन गुप्तियों के, अष्ट प्रातिहार्य, अनंत चतुष्टय के व सिद्धों के अष्ट मूलगुणों के अर्घ हैं। यह विधान श्रावकों के लिए विधेय है।

याग मंडल विधान एवं पंचकल्याणक पूजा (yag mandal vidhan aur panchkalyanak Pooja)
प्रस्तुत कृति "यागमंडल विधान एवं पंचकल्याणक पूजा" में परम पूज्य आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज की लेखनी से प्रसूत भक्ति से समन्वित अद्भुत रचना है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, वेदी प्रतिष्ठा, कलशारोहण, दीक्षा आदि कार्यों में इस विधान को ही संपन्न किया जाता है।
इस विधान में शब्दों का निर्माण, छंद आदि लयबद्ध तरीके से सरल, सहज अर्थपूर्ण ढंग से किया गया है, जिसे पढ़कर भव्य प्राणी सहज भक्ति सागर में सराबोर हो जाते हैं। सभी सातिशय पुण्यार्जन करें इसी अभिलाषा से प्रस्तुत कृति का प्रकाशन किया गया है।