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घर में जल का स्थान

भगवान महावीर ने दो प्रकार के धर्मों का प्रतिपादन किया- श्रमण धर्म और श्रावक धर्म। इनमें श्रावक धर्म का अनुसरण करने वाले जीव संसार में अधिक देखे जाते हैं। उन मानवों की मूलभूत आवश्यकताओं में तीन वस्तुओं की सर्वाधिक चर्चा होती है- भोजन, वस्त्र और भवन। वास्तु का ज्ञान कराने वाले शास्त्र को वास्तु शास्त्र कहते हैं। हलायुध कोश के अनुसार वास्तु का अर्थ है - "वास्तु संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादो विघ्न नाशनम्। ईशानकोणादारभ्य ह्योकाशीतिपदे त्यजेत्" अर्थात वास्तु संक्षेप में ईशान आदि कोण से प्रारंभ होकर गृह निर्माण की वह कला है जो गृह को विघ्न- प्राकृतिक उपद्रवों  से बचाती है। वास्तु विज्ञान अत्यंत वृहद् है किंतु अभी हम  भवन में जल की स्थिति, स्रोत आदि के विषय में  जानते हैं।
 जल का स्रोत उत्तर पूर्व अर्थात् ईशान कोण में होना चाहिए। शुद्ध जल प्रवाह (water flow) उत्तर वा पूर्व और अशुद्ध जल प्रवाह उत्तर पश्चिम वायव्य कोण में होना चाहिए। जल प्रवाह आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम दिशा में कदापि नहीं होना चाहिए। पानी की टंकी छत पर वायव्य व उत्तर दिशा के मध्य या वायव्य व पश्चिम दिशा के मध्य रखनी चाहिए। भूमिगत पानी की टंकी उत्तर व पूर्व दिशा में होनी चाहिए। सर्वोत्तम स्थान ईशान कोण है। नैऋत्य,आग्नेय,वायव्य व दक्षिण दिशा में कदापि ना रखें।
कुआं, ट्यूबवेल व हैंडपंप सदैव ईशान कोण में ही खुदवाना चाहिए।अन्य दिशा में खुदवाना अशुभ है।ट्यूबवेल उत्तर पूर्व में नहीं है तो अवश्य लगाएं।अन्य दिशा में हो तो उसे बंद करवा दें।जलाशय पूर्व में पुत्र नाश,आग्नेय कोण में अग्नि भय,दक्षिण में शत्रु भय, नैऋत्य में स्त्री कलह, पश्चिम में स्त्री दुष्टा हो जाए,वायव्य में निर्धनता,उत्तर में धन प्रदा और ईशान कोण में पुत्र कारक होता है।

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घर में पूजागृह संबंधी वास्तु

1. भवन में पूजा घर का निर्माण ईशान कोण व उत्तर दिशा के मध्य अथवा ईशान कोण व पूर्व दिशा के मध्य कराना चाहिए।
2.पूजा घर का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि पूजा करते समय पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे।
3.पूजा घर कभी भी शयनकक्ष में नहीं बनवाना चाहिए यदि परिस्थिति वश ऐसा करना ही पड़े तो वह शयनकक्ष विवाहितों के लिए नहीं होना चाहिए। यदि परिस्थिति वश विवाहितों को भी उसी शयनकक्ष में सोना है तो पूजा स्थल पर सभी ओर से पर्दा ढक दें।
4.पूजा घर को सदैव शुद्ध, स्वच्छ एवं पवित्र रखें। इसमें कोई भी अपवित्र वस्तु न रखें अर्थात् भवन में ईशान कोण सदैव स्वच्छ व  शुद्ध होना चाहिए।
5. पूजा घर के निकट एवं भवन के ईशान कोण में झाड़ू एवं कूड़ेदान आदि नहीं रखने चाहिए। पूजा घर को साफ करने का झाड़ू- पोछा भवन के अन्य कक्षों को साफ करने की झाड़ू - पोछा से अलग रखें।
6.पूजा घर में किसी प्राचीन मंदिर से लाई गई प्रतिमा एवं स्थिर प्रतिमा की स्थापना नहीं करनी चाहिए।
7.पूजा घर में यदि हवन आदि की व्यवस्था की गई है तो यह व्यवस्था पूजा घर के आग्नेय कोण में होनी चाहिए।
8. पूजा घर में कभी भी धन एवं बहुमूल्य वस्तुएं नहीं छुपानी चाहिए।
9. पूजा घर की दीवारों का रंग सफेद हल्का पीला अथवा हल्का नीला होना चाहिए।पूजा घर का फर्श सदैव सफेद अथवा हल्के पीले रंग का होना चाहिए।
10. पूजा घर में प्रतिमाएं कभी भी प्रवेश द्वार के सन्मुख नहीं होनी चाहिए।

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स्नानगृह एवं शौचालय संबंधी वास्तु सिद्धांत

1.स्नानगृह के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दिशा पूर्व होती है।
2. स्नानगृह दक्षिणी अथवा पश्चिमी नैर्ऋत्य कोण में भी बनवाया जा सकता है।
3.यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है तो स्नान गृह पश्चिम नैर्ऋत्य में बनाना चाहिए।
4.यदि भवन का मुख्यद्वार पूर्व दिशा की ओर है तो स्नानगृह पूर्वी आग्नेय में बनाना चाहिए।
5.यदि भवन का मुख्यद्वार उत्तर दिशा की ओर है तो भी स्नानगृह पूर्व अथवा पूर्वी आग्नेय में बनाना चाहिए।
6.  स्नानगृह का द्वार पूर्व अथवा उत्तर में होना चाहिए।
7. स्नानगृह के फर्श का ढाल पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होना चाहिए।
8.स्नानगृह में शावर ईशान कोण, उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए।
9. यूं तो शौचालयगृह में बनाना नहीं चाहिए परंतु यदि बनाना आवश्यक ही है तो यह स्नानगृह में पश्चिम अथवा वायव्य कोण की ओर बनाना चाहिए।
10.स्नानगृह में बाथटब पूर्व, उत्तर अथवा ईशान कोण में रखा जाना चाहिए।
11.स्नानगृह एवं शौचालय का द्वार रसोई घर के द्वार के ठीक सामने नहीं होना चाहिए।
12.भवन में शौचालय पश्चिम, वायव्य कोण से हटकर उत्तर की ओर अथवा दक्षिण में होना चाहिए।
13. शौचालय का दरवाजा पूर्व अथवा आग्नेय की तरफ खुलने वाला होना चाहिए। 
14.शौचालय का फर्श भवन के फर्श से एक अथवा दो फीट ऊंचा होना चाहिए।
15. शौचालय में सीट इस प्रकार लगी होनी चाहिए कि बैठते समय आपका मुंह दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा की ओर रहे।
16.शौचालय में पानी की टोंटी पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होनी चाहिए।
17.शौचालय में संगमरमर की टाइल्स का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।18. शौचालय में एक खिड़की उत्तर, पश्चिम अथवा पूर्व दिशा में होनी चाहिए।
 19.संयुक्त स्नानगृह एवं शौचालय पश्चिम वायव्य या पूर्व दिशा में बनाना चाहिए।
20. संयुक्त स्नानगृह एवं शौचालय का दरवाजा मध्य- पूर्व में रखा जा सकता है।
21.संयुक्त स्नानगृह एवं शौचालय में शावर एवं नल ईशान कोण में होने चाहिए।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री