
को विवेगी ( विवेकी कौन) (Ko Vivegi)
मनुष्य की शालीनता के तीन उपस्तम्भ हैं - समाज, संस्कृति व सभ्यता। विवेकवान् व्यक्ति ही इन क्षेत्रों में अपने व्यक्तित्व को उद्भासित कर सकता है। विवेकी व्यक्ति ही समाज का प्रिय, यशस्वी और तिलकायित बनता है। आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित यह "को विवेगी" नामक प्राकृत ग्रन्थ संस्कृति, सभ्यता का पोषक व संवाहक है। 84 गाथाओं के माध्यम से विवेकी व्यक्ति के लक्षणों का कथन करने वाला यह अनुपम ग्रंथ है।

तित्थयर- णामत्थुदी (तीर्थंकर नाम स्तुति) (Teerthankar Naam Stuti)
जो श्रद्धा और विश्वास के युगल नेत्रों से भगवान् की शरण ग्रहण करता है उसे निश्चय ही परम कृतार्थता प्राप्त होती है। परमात्मा का नाम स्मरण मात्र ही सहस्त्रों पापों का क्षय करने में समर्थ है। वास्तव में जिनस्तुति पुण्य प्रसाधक परिणामों की कामधेनु है। परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ"तित्थयर- णामत्थुदी (तीर्थंकर नाम स्तुति) में तीस चौबीसी अर्थात् 720 जिनेंद्रों की नामस्तुति की गई है। तन्मयतापूर्वक इसका पाठ एक क्षण में भव-भव के वरदान प्राप्ति का कारण हो सकता है।

पुण्णासव- णिलयो (पुण्यास्रव निलय) (Punyashrava Nilaya)
नि:कांक्ष भाव से किया गया पुण्य अरिहंत पद को देने में समर्थ होता है। प्रस्तुत ग्रन्थ "पुण्णासव- णिलयो"(पुण्यास्रव निलय) आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 228 गाथाओं में निबद्ध है। ग्रंथ की प्रत्येक गाथा पुण्य की प्रेरिका है। यह पुण्य की छांव में ले जाने में समर्थ है। पापों से भीति व पुण्य में प्रीति उत्पन्न कराने वाला यह अद्भुत ग्रन्थ है।

अप्पणिब्भर-भारदं (आत्म निर्भर भारत) (Aatma Nirbhar Bharat)
देश के सुदृढ़ व विकसित होने के लिए उसकी स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता महत्त्वपूर्ण या प्रथम घटक है। आत्मनिर्भर देश ही दीर्घकाल तक अपने अस्तित्व का संरक्षण करने व विश्व में सुख-शांति की स्थापना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित "अप्पणिब्भर- भारदं"(आत्म निर्भर भारत)नामक इस ग्रंथ में किस प्रकार से देश आत्मनिर्भर हो सकता है, किन कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाये इत्यादि का वर्णन किया गया है।

कला- विण्णाणं (कला विज्ञान) (Kala Vigyan)
मनुष्य में अभिव्यक्ति की अदम्य इच्छा होती है। वह जिन संस्कारों से लालित-पालित होता है उन्हीं को अपने व्यवहार में प्रकट करता है। लेखन, पठन, संगीत, वाणी आदि के माध्यम से उस व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व सहज ही ज्ञात हो जाता है। परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 372 गाथाओं में निबद्ध प्रस्तुत "कला-विण्णाणं" (कला विज्ञान) नामक ग्रंथ में पुरुषों की 72 व स्त्रियों की 64 कलाओं का वर्णन किया गया है। कला से युक्त जीवन स्वपर के लिए वरदान स्वरूप होता है।

अप्प-सत्ति (आत्म शक्ति) (Atma Shakti)
प्रत्येक आत्मा अनंत शक्ति से युक्त है। आत्मा की शक्ति से अनभिज्ञ जीव पुण्यापुण्यास्रवजायमान शरीर संयोग से नाना योनियों में परिभ्रान्त होकर जन्म-जरा-मृत्यु चंक्रमण रूप किट्ट कालिमा में निग्रहीत होता आ रहा है। इसकी अग्नि विशुद्धि स्वरूपावस्थान है। यह स्वपद जीव निजात्म शक्तियों को जानने पर ही प्राप्त कर सकता है। एतदर्थ आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा यहां आत्मा की लगभग 61शक्तियों का विवेचन किया गया है।

वयण-पमाणत्तं (वचन प्रमाणत्व) (Vachan Pramanatva)
नय प्रमाणादि के द्वारा ही वस्तु तत्व का सम्यक् अवबोध संभव है। इन्हीं नयादि के द्वारा परीक्षण कर तत्वों का ग्रहण करना चाहिए। आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत 543 गाथाओं में निबद्ध "वयण-पमाणत्तं" नामक ग्रंथ न्याय रूपी दुर्ग में प्रवेश हेतु तोरणद्वार ही है। द्रव्य के लक्षण, गुण, पर्याय, स्वभाव, प्रमाण, नयादि का विवेचन करने वाला यह ग्रन्थ पठनीय व स्मरणीय है।

तच्च- सारो (तत्त्व सार) (Tattva Saar)
परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत "तच्च-सारो"(तत्वसार)ऐसी जीवन रचना दिखलाने वाला मानचित्र है जिसके द्वारा हम स्वयं के आदर्शों को पा सकें, आंतरिक आचार संगठन को सुदृढ़ बना सकें व धर्ममय जीवन व्यतीत करके नैष्कर्म अवस्था को प्राप्त कर सकें।

अनुवेक्खा-सारो (अनुप्रेक्षा सार) (Anupreksha saar)
वैराग्य और आत्मिक सौंदर्य की जननी कहलाने वाली इन द्वादश अनुप्रेक्षाओं का अद्भुत निरूपण आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित 297 निबद्ध गाथाओं वाले इस "अनुवेक्खा-सारो" (अनुप्रेक्षा सार)नामक ग्रंथ के अंतर्गत किया गया है, जो जीवन की धारा को सम्यक् लक्ष्य की और परिवर्तित करने में समर्थ है।

रयणकंडो (प्राकृत सूक्ति कोश) Rayan kando( prakrit sukti kosh)
प्रस्तुत ग्रंथ "रयणकंडो" (प्राकृत सूक्ति कोश) में लगभाग 600 विषयों पर प्राकृत, हिंदी और अंग्रेजी भाषा की लोकोपयोगी 3333 सूक्तियों का अनुपम लेखन संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी और आबालवृद्ध और विद्वान् से जनसामान्य तक सभी के लिए सुबोध इस ग्रंथ में अकारादि क्रम से नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक, ज्योतिष, वास्तु आदि विषयों पर भी जीवन निर्माण के सूत्र प्रदान किए गए हैं।

कम्म-सहावो (कर्म स्वभाव) (Karma Swabhaav)
आचार्य भगवन् श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा कर्म के मूल भेद, उत्तर भेद और प्रकृति, प्रदेश, स्थिति एवम् अनुभाग इन 4 प्रकार के बंधनों का कथन 597 गाथाओं में निबद्ध इस "कम्म-सहावो" (कर्म स्वभाव) नामक प्राकृत ग्रन्थ में किया गया है।किन कर्मों का बंध किन कारण और प्रत्ययों से होता है इसका कथन इस सिद्धांत ग्रंथ में बहुत ही विशेष रूप से किया गया है जो निश्चय ही भावभीरुता और सम्यक् बोध का कारण है।

अज्झप्प-सुत्ताणि (अध्यात्म सूत्र) (Adhyatma Sutra)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा 3 अध्याय और 168 सूत्रों में रचित ये प्राकृत ग्रंथ "अज्झप्प-सुत्ताणि" (अध्यात्म सूत्र) विश्व की सर्वोच्च विद्या, आध्यात्मिक विद्या के सूत्रों का प्रतिपादन करने वाली है। ये आध्यात्मिक सूत्र मिथ्यात्व, अज्ञान और असंयम के अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य के समान है।
नोट- मन की शांति और तनाव से बचने के लिए इसका अध्ययन अवश्य करें।

Mool Varn
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मूल- वण्णो (मूल वर्ण) 84 गाथाओं में निबद्ध है। शब्द भावों की अभिव्यक्ति का कारण हैं। वर्णों से शब्द, शब्द से पद और पदों से वाक्यों का निर्माण होता है। ये वर्ण मूलतः 64 हैं, 64 वर्णों और वर्ण की पृथक्-पृथक् शक्तियों का कथन करने वाला यह अद्भुत ग्रंथ है।

विस्स-पुज्जो दियंबरो (विश्व पूज्य दिगंबर) vishva pujya digamber
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्राकृत ग्रंथ "विस्स-पुज्जो दियंबरो" (विश्व पूज्य दिगंबर) 165 गाथाओं में निबद्ध है। सर्व पाप-आरंभ त्यागी, सूक्ष्म जंतुओं की भी विराधना से रहित, सर्व भौतिक संसाधनों से विरक्त, तप-त्याग-संयमादर्श, करतल भोजी, तरुतलवासी, आजीवन पदविहारी, असीम दयावान्, वस्त्रादि परिग्रह से रहित दिगंबर मुनि पूजनीय हैं। यह ग्रंथ उनके मार्ग तक पहुंचने का कथंचित् विधान और स्वरूप, चर्या व पूज्यता आदि का वर्णन करने वाला है।

णमोकार - महप्पुरो (णमोकार महात्म्य) namokar mahatmy
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "णमोयार-महप्पुरो" (णमोकार महात्म्य) 159 गाथाओं में निबद्ध है। द्वादशांग के सारभूत जिस मंत्र का एक बार स्मरण जीव को शुभायु, शुभ गति की ओर प्रेरित कर देता है, जिसमें विश्व की समस्त शक्तियों का निवास है, जो असाध्य को साध्य करने की सामर्थ्य से युक्त है, उस महामंत्र की शक्ति, प्रभाव और मंत्र के महात्म्य आदि को दर्शाने वाला यह ग्रंथ अनुपमेय है।

विश्व धर्म (विस्स-धम्मो ) (vishva dharm) (world's religions)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "विस्स-धम्मो" (विश्व धर्म) 165 गाथाओं में निबद्ध है।
वस्तु का स्वभाव धर्म है। कार्य में कारण का उपचार कर स्वभाव तक पहुंचाने वाले गुण निमित्तादि भी धर्म हैं। यह ग्रंथ मानवीय गुणों का कथन करने वाला, धर्म की अखंडता, एकता और समन्वयता का परिचायक है।

समवसरण-सोहा (समवशरण शोभा) (samavsharan Shobha)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "समवसरण सोहा" (समवशरण शोभा) 786 गाथाओं में निबद्ध है। तीर्थंकरों की धर्म सभा तीनों लोकों की श्रेष्ठ धर्म सभा है जिसके लिए संपूर्ण शोभा-सुरम्यता के वर्णन में कथंचित् गणधर भी समर्थ नहीं हैं। समवशरण की रचना तीन लोक की लक्ष्मी का एक स्थान पर एकत्रित होने का भ्रम पैदा करने वाली होती है। यह ग्रंथ वर्तमान कालीन चौबीस तीर्थंकरों की समवशरण भूमि, कोटादि और शिष्यादि का परिमाण एवं उसकी अनुपम शोभा का दिग्दर्शन कराता है।

अट्ठंग-जोगो (अष्टांग योग) ashtanga yoga
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "अट्ठंग-जोगो" (अष्टांग योग) 273 गाथाओं में निबद्ध है। योग देह और आत्मा दोनों के लिए स्फूर्ति प्रदायक, आरोग्यकारक, दुख-क्लेशनाशक और सुख-शांति वर्धक है। जीव के चरम और परम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु यह ग्रंथ श्रेष्ठ रथ के समान है जिस पर आरूढ़ हो संसार की दुर्गम, विलंघ्य खातिकाओं को पार कर मोक्ष महल में प्रवेश पाया जा सकता है।

अप्प- विहवो (आत्म वैभव) atma vaibhav
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रन्थ अप्प- विहवो (आत्म वैभव) 378 गाथाओं में निबद्ध है। अंतरंग के वैभव का दिग्दर्शन करने वाला यह ग्रंथ मानो आत्म-दर्शन ही हो। आत्मा की विशाल निधि और उसे प्राप्त करने के मार्ग के मानचित्र के समान यह अनुपम ग्रंथ है।

मंगल- सुत्तं (मंगल सूत्र) Mangal sutra
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "मंगल-सुत्तं" (मंगल सूत्र) 111 गाथाओं में निबद्ध है। यह ग्रंथ जीवन को मंगल व प्रशस्त करने वाले सूत्रों से युक्त, व्यवहार और निश्चय से युक्त, आध्यात्मिक मंदाकिनी के स्वरूप का परिज्ञान कराने वाला है।

सिरिसीयलणाह-चरियं (श्री शीतलनाथ चरित्र) (Shree SHEETALNATH charitra)
प्रस्तुत ग्रन्थ " श्री शीतलनाथ चरित्र" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित प्राकृत महाकाव्य है। महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने से नैतिक मूल्यों का संवर्द्धन, संस्कारों व सभ्यता का बीजारोपण, हित-अहित परिज्ञान , परिवार, समाज, राष्ट्र व देश के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान, क्षमादि गुणों का विकास होता है। महाकाव्य की विधा में लिखित विभिन्न अलंकार, रस व छंदों से युक्त इस ग्रंथ में दसवें तीर्थंकर श्री शीतलनाथ भगवान् का चरित्र निश्चय ही प्रेरणादायक, दोषहारक व पुण्यकारक है।

राष्ट्र शांति महायज्ञ (रट्ठ- संति- महाजण्णो) (rastra Shanti mahayajna)
राष्ट्र में निर्मित प्रशस्त राजपथ व उत्तुंग इमारतें राष्ट्र में सुख-शांति की स्थापना करने में संभव नहीं। राष्ट्र की पहचान उसमें विचरण करने वाले आचारवान् मनुष्यों से है। सुरभित करने वाले पुष्पों से रहित उपवन महत्वहीन ही प्रतीत होता है, अतः राष्ट्र रूपी उपवन को पुनः महकाने हेतु, उसमें सुख-शांति की स्थापना हेतु विभिन्न पदासीन व्यक्तियों के कर्तव्य व महत्वपूर्ण घटकों का वर्णन परम पूज्य आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी महाराज ने रट्ठ-संति-महाजण्णो (राष्ट्र शांति महायज्ञ) नामक इस ग्रन्थ के अन्तर्गत किया है।

सुद्धप्पा (शुद्धात्मा )(shuddhatma)
परम पूज्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा लिखित प्रस्तुत प्राकृत ग्रंथ "सुद्धप्पा" (शुद्धात्मा) 174 श्लोकों में निबद्ध है। यह एक गूढ़ आध्यात्मिक ग्रंथ है। इसका प्रत्येक कार्य मानों भेदविज्ञान का सूत्र है। आध्यात्मिक सरोवर में अवगाहन करने हेतु इस ग्रंथ को अवश्य पढ़ना चाहिए।

अशोक रोहिणी चरित्र (Ashok rohini charitra)
प्रस्तुत ग्रंथ"असोग-रोहिणी-चरियं" (अशोक रोहिणी चरित्र) नामक महाकाव्य आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित दिगंबर परम्परा का सबसे वृहद् प्राकृत महाकाव्य है, जो 2442 गाथाओं में निबद्ध व 21 नंदों में विभक्त है। यह महाकाव्य रोहिणी व्रत के माहात्म्य को प्रदर्शित करने वाला है। इसमें अशोक व रोहिणी का अत्यंत प्रेरणादायक चरित्र है। यह ग्रंथ बहुत सरल, रुचिकर व महत्वपूर्ण है। प्रत्येक श्रावक को इस ग्रंथ का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए।




प्राकृत वाणी भाग-४ (prakrit Vani part-4)
प्रस्तुत कृति "प्राकृत वाणी भाग-4" आचार्य श्री वसुनंदी जी महाराज द्वारा रचित तीन प्राकृत ग्रंथों का संग्रह है। जिसमें "पसम भावो", " लोगुत्तर वित्ती" एवं "अशोक रोहिणी चरित्र " नामक ग्रंथ संकलित हैं। प्राकृत वाणी के प्रथम भाग में 12 , द्वितीय भाग में 9 , तृतीय भाग में 7 प्राकृत ग्रंथ संकलित हैं।


समण- भावो ( saman bhavo)
परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुदेव द्वारा रचित 'समण- भावो' नामक ग्रंथ 228 गाथाओं में निबद्ध है। श्रमण अर्थात् मुनियों, दिगम्बर साधुओं के किस समय या परिस्थिति में कैसे भाव होते हैं या होने चाहिए उनका बहुत सुंदरतम वर्णन किया गया है। मन: विशुद्धि के लिए इसे अवश्य पढना चाहिए।