Namo jinanam

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चित्रसेन पद्मावती चरित्र (Chitrasen Padmavati Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ में भगवान महावीर स्वामी के समय में हुए चित्रसेन और पद्मावती के शील व्रत का वर्णन किया गया है।
 पंडित पूर्णमल्ल जी द्वारा ग्रंथ का सरल भाषा में कथन करते हुए रचना की गई है।
 इस पौराणिक कथा में आहार दान की अनुमोदना करने मात्र से ही हंस युगल चित्रसेन और पद्मावती हुए।

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नंग अनंग कुमार चरित्र (Nang Anang Kumar Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "नंग अनंग कुमार चरित्र" करोड़ों मुनिराजों की साधना एवं सिद्धत्व से पुनीत स्वर्णगिरि/श्रमणगिरि/सोनागिर से मोक्ष पधारे दो भाई नंग और अनंग कुमार के जीवन पर रचित है। इस छोटे से ग्रंथ में भी कविवर ने गागर में सागर की तरह  धर्म का मर्म भर दिया है। यह ग्रंथ 16 अध्याय एवं 1114 श्लोकों द्वारा रचकर मार्गशीर्ष सुदी 4, वि.सं. 1845 में पूर्ण हुआ।

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यशोधर चरित्र (Yashodhar Charitra)

यशोधर महाराज जिन्होंने आटे के मुर्गे की बलि दी। इस भाव हिंसा के कारण एवं मातृमोह के कारण सुदीर्घ काल तक नाना कुयोनियों में भ्रमण करते हुए शब्दातीत दुःखों को प्राप्त किया पुनः वे अभयकुमार एवं उनकी मां का जीव अभयमति के रूप में उत्पन्न हुए, मुनिराज से अपने पूर्व जन्म का वृतांत सुन विरक्त हो क्षुल्लक क्षुल्लिका बने बाद में उन्होंने अपने मामा को उपदेश देकर जैनधर्म में अनुरक्त कराया। यह शास्त्र आबालवृद्धों के लिए पठनीय है एवं हिंसादि पापों से विरक्ति का प्रेरक है।

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शांतिनाथ पुराण भाग-1 (Shantinath Puran Part-1)

प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-1" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है।  ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है।
    कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक संदर्भों का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।

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शांतिनाथ पुराण भाग-2 (Shantinath Puran Part-2)

प्रस्तुत ग्रंथ "शांतिनाथ पुराण भाग-2" 16 वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी के जीवन पर आधारित है, जो उनके तीर्थंकर, कामदेव एवम् चक्रवर्ती पद के अनुकूल वर्णित है। ग्रंथ सरल हिंदी भाषा में रचित है।  ये ग्रंथ दो भाग में उपलब्ध है।
  कविवर असग जी ने इस ग्रंथ में जैन सिद्धांतों के गूढ़तम रहस्यों का सूक्ष्म विश्लेषण, यथार्थ घटनाओं का वर्णन और संसार की दशाओं के दर्शायक सन्दभोंस का हृदयतल स्पर्शी-व्याख्यान किया है, साथ ही चारों अनुयोगों को अविनाभावी रूप से संलग्न किया है।

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श्री जम्बूस्वामी चरित्र (Jambu Swami Charitra)

जम्बूस्वामी चरित्र
 श्री वीर कवि द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रन्थ अंतिम अनुबद्ध केवली श्री जम्बूस्वामी जी पर आधारित है जिसमें उनके जीवन में उतर-चढ़ाव को सरल और अलंकारों से युक्त विशेषणों से दर्शाया है।
 जम्बूस्वामी और उनकी पत्नियों की कथा रूप में जो वार्ताएं हैं वे भव भिरुओं को वैराग्यवर्धक और रागियों को संसार का कारण हैं।
 ग्रंथ की शैली उपन्यास की तरह अत्यंत रोचक, तत्त्वबोध युक्त है जो वैराग्य का प्रबल निमित है।

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महीपाल चरित्र (Mahipal Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ में राजा महीपाल को नायक मानते हुए उनके जीवन चरित्र के माध्यम से धर्म की महिमा बतलाई है।
 कविराज चारित्र भूषण द्वारा रचित ये ग्रंथ सरल और संक्षेप में उपलब्ध है। इस ग्रंथ का स्वाध्याय चारों पुरुषार्थों की प्रेरणा देने वाला है और श्रावकों और श्रमणों के लिए अत्युपयोगी है।

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प्रभंजन चरित्र (Prabhanjan Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "प्रभंजन चरित्र" में पुण्य पाप के फल का विशद व्यख्यान, पिता पुत्र का स्नेह, पूर्वभव में बांधे गए बैर का प्रतिफल, स्त्री का स्वभाव, अणुव्रत-महाव्रत का महत्व, संसार की दशा इत्यादि विषयों का विस्तार से वर्णन कविवर ब्रह्मराय जी द्वारा किया गया है।
 देखने में तो बहुत छोटा सा ग्रंथ है किंतु इसमें वर्णित विषय संसार, शरीर-भोगों की यथार्थता का प्रतिबोधक है। वैराग्य की शिक्षा जीवंत उदाहरणों द्वारा दी गई है।
 नोट-यह ग्रंथ प्राचीन ग्रंथों में से एक है जिन्हें लुप्त होने के भय से पुनः प्रकाशित किया गया है।

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धन्यकुमार चरित्र (Dhanya Kumar Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "धन्य कुमार चरित्र" की रचना आचार्य श्री सकलकीर्ति जी द्वारा समस्त वर्ग को ध्यान में रखते हुए की गई है जिसमें सरल, सहज, हृदयाग्राह्य व सुगम शब्दों का उपयोग करते हुए चरित्रनायक धन्यकुमार के भवों का वर्णन किया है।
 आहारदान की अनुमोदना करने मात्र से तथा पंच नमस्कार मंत्र और अणुव्रतों को ग्रहण कर अकृतपुण्य स्वर्गाधिकारी हो धन्यकुमार सेठ हुआ।

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करकण्डु चरित्र (Karkandu Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "करकण्डु चरित्र" कर्म व भावों के फल को राजा करकण्डु के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इस ग्रंथ में पूर्व भव में किए पाप और पुण्य के फल का चित्र देख सकते हैं।
 इस ग्रंथ की रचना मुनि श्री कनकामर जी द्वारा संभवत: ईस्वी सन् 965 के पूर्व में हो चुकी थी।

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सुशीला उपन्यास (Sushila Upanyas)

गोपाल दास बरैया द्वारा रचित प्रस्तुत "सुशीला उपन्यास" समाज में विद्यमान बुराईयों का विध्वंसक, धार्मिक भावनाओं का संप्रेरक, नीति-रीति का पक्षधर, पाप भीरुता और वैराग्य का संपोषक है। यह विश्व का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें जैन दर्शन में निहित कर्म सिद्धांत चर्चा, गुणस्थान कथन और क्षपक एवम् उपशम श्रेणी के आरोहक योगियों के परिणामों के बारे में अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण का दृष्टांतों के द्वारा अत्यंत सरल शब्दों में विवेचन किया है। भाषा सरल और बोधगम्य है।

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सुभौम चक्रवर्ती चरित्र (Subhom Chakravarti Charitra)

आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा संपादित प्रस्तुत ग्रंथ 9वें चक्रवर्ती सुभौम के जीवन चरित्र पर आधारित है। महामंत्र णमोकार के अनादर के फल, विषयों में आसक्त होने का परिणाम, पुण्य-पाप का प्रत्यक्ष फल बताने वाला सरल और पापों से भयभीत कर धर्म की प्रेरणा देने का प्रबल निमित्त है।
 भट्टारक रत्नचंद जी द्वारा रचित इस ग्रंथ में सुभौम चक्रवर्ती के भवों का वर्णन 7 सर्गों और 822 आर्या छंदों के निमित्त से बड़े ही मनोहर वचनों में किया गया है।

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सुकुमाल चरित्र (Sukumal Charitra)

आचार्य श्री सकलकीर्ति जी द्वारा रचित "सुकुमाल चरित्र" नामक प्रशस्त ग्रंथ का संपादन आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा किया गया है। जो उपसर्ग विजेता मुनि सुकुमाल के चरित्र पर आधारित है। उनके गृहस्थ जीवन में पालन पोषण, राज्य और वैराग्योपरांत तपस्या एवं उपसर्ग का बड़े सुंदर और रोचक रूप से दर्शन है।
 प्रस्तुत कृति अज्ञान से तमोवृत भवारण्य में पथ भ्रष्ट हो, संसार में भटकते हुए भव्य प्राणियों के लिए सद्ज्ञान रश्मि के समान है। यह मुनि निंदा जैसे जघन्यतम अपराधों से मुक्ति दिलाने वाला और धर्म का अचिन्त्य महात्म्य प्रकाश करने वाला शास्त्र है।

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सम्यक्त्व कौमुदी (Samyaktva Kaumudi)

प्रस्तुत ग्रंथ "सम्यक्त्व कौमुदी" में विभिन्न कहानियों के माध्यम से सम्यग्दर्शन के महत्व को दर्शाते हुए उसे प्राप्त करने की प्रेरणा दी है। भव सागर से पार होने के इच्छुक जीवों के लिए इस ग्रंथ में ग्रंथकार ने सम्यक्त्व उत्पत्ति की 8 कथाओं का जिस रोचक शैली से वर्णन किया है वैसा वर्णन अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।

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पुण्यास्रव कथा कोश भाग-1 (Punyashrav Katha Kosh Bhag- 1)

श्री रामचंद्र मुमुक्षु द्वारा रचित "पुण्यास्रव कथा कोश भाग -1" ग्रंथ अत्यंत सरल भाषा में रचा गया है जिसमें 6 अधिकारों के माध्यम से पुण्यास्रव के 6 कारणों का ही वर्णन है। 
 1. जिनेन्द्र पूजन 2. णमोकार महात्म्य 3. स्वाध्याय का फल 4. शीलव्रत का फल 5. उपवास का फल 6. दान का फल - इनकी 57 कथाएं लिपिबद्ध हैं।
 प्रारंभिक स्वाध्यायार्थी के लिए इस ग्रंथ का मात्र हिंदी अनुवाद ही 2 भागों में प्रकाशित किया गया है।

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पुण्यास्रव कथा कोश भाग-2 (Punyashrav Katha Kosh Bhag - 2)

श्री रामचंद्र मुमुक्षु द्वारा रचित "पुण्यास्रव कथा कोश भाग-2" ग्रंथ अत्यंत सरल भाषा में रचा गया है जिसमें 6 अधिकारों के माध्यम से पुण्यास्रव के 6 कारणों का ही वर्णन है।
 1. जिनेन्द्र पूजन 2. णमोकार महात्म्य 3. स्वाध्याय का फल 4. शीलव्रत का फल 5. उपवास का फल 6. दान का फल - इनकी 57 कथाएं लिपिबद्ध हैं।
 प्रारंभिक स्वाध्यायार्थी के लिए इस ग्रंथ का मात्र हिंदी अनुवाद ही 2 भागों में प्रकाशित किया गया है।

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हनुमान चरित्र (Hanuman Charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "हनुमान चरित्र" मोक्षगामी कामदेव श्री हनुमान जी पर आधारित है। उनके जीवन काल पर चित्रित समस्त उतार-चढ़ाव को दर्शाता है, जिसके पठन- पाठन से जीवन में वैराग्य, समता और सेवा भाव जागृत होता है। कविवर ब्रह्यराय जी द्वारा रचित ये ग्रंथ आबाल वृद्ध सभी आत्म-कल्याणेच्छुओं के लिए स्वाध्याय करने योग्य, सरल और सुगम भाषा में लिपिबद्ध है।
 मोक्षगामी महापुरुष श्री हनुमान जी के संबंध में लोगों में फैली हुई कपोल कल्पनाओं को दूर करने के लिए उनका यथार्थ एवम् सत्य रूप जीवन चरित्र वर्णित है।

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पुराण सार संग्रह (Puran Saar Sangrah)

आचार्य दामनंदि जी द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "पुराण सार संग्रह" अनुपम पठनीय, मननीय, श्रव्य, श्राद्धय, ध्यातव्य व अनुकरणीय है।
 जो व्यक्ति आदि पुराण, हरिवंश पुराण, पद्म पुराण आदि दीर्घ काय ग्रंथ को देखकर पढ़ने से घबराते हैं, उन महानुभावों के लिए ये कृति अत्यंत उपयोगी है।

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नागकुमार चरित्र (Naag Kumar Charitra)

आचार्य श्री मल्लिषेण जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "नाग कुमार चरित्र" अत्यंत प्रेरणादायी, वैराग्य प्रद एवं आनंददायक है। ये मगध देश के राजकुमार श्री नागकुमार के जीवन चरित्र पर आधारित है जिनकी कुल आयु 1000 वर्ष थी। इस ग्रंथ में अत्यंत सरल व रोचक रूप से पाप-पुण्य का विवेचन सबके हित की भावना से किया गया है।

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जिनदत्त चरित्र (Jindutta Charitra)

श्री गुणभद्राचार्य जी द्वारा रचित "जिनदत्त चरित्र" नामक यह ग्रंथ अरिहंत मत का अवलंबन लेने वाले जिनदत्त स्वामी के चरित्र का वर्णन करने वाला श्रेष्ठ ग्रंथ है, जो भव्य जीवन को मोक्षमार्ग की प्रेरणा देने वाला, संसार- शरीर-भोगों के यथार्थ स्वरूप का दिग्दर्शन कराने वाला है।

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सती मनोरमा (Sati Manorma)

प्रस्तुत कृति सती मनोरमा पर आधारित नाटक से संबंधित है जो 3 अंकों में निबद्ध है। प्रथम अंक में 11 दृश्य, द्वितीय में भी 11 और तृतीय में कुल6 दृश्यों के माध्यम से सती मनोरमा पर नाटक दर्शाया गया है।

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अमरसेन चरित्र (Amarsen Charitra)

कविवर माणिक्कराज जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "अमरसेन चरित्र" प्रथमानुयोग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। अमरसेनके साथ साथ वइरसेन का जीवन चरित्र सार रूप से वर्णित किया है।
 प्रस्तुत कृति में 7 संधियों में 114 कवड़क और 1741 यमक पदों के द्वारा रुचिकर अपभ्रंश भाषा में अनुपम रचना की है।

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श्रीपाल चरित्र (Shripal Charitra)

आचार्य सकलकीर्ति जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रीपाल चरित्र"  श्रीपाल कामदेव के जीवन चरित्र का प्रत्यक्षवत् वर्णन करने वाला है। इसमें राजा श्रीकंठ के भव से लेकर श्रीपाल के मोक्ष तक का वर्णन अत्यंत सरल भाषा में किया गया है। इसके स्वाध्याय से भवभीरुता, पापों से विरक्ति, संसारिक भोगों के प्रति उदासीनता, शरीर के प्रति निर्ममत्व भाव, संयम की तीव्र पिपासा और आत्म-कल्याण की उत्सुकता प्रकट होती है।

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सप्त व्यसन चरित्र(Sapt Vyasan Charitra)

आचार्य श्री सोमकीर्ति भट्टारक जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "सप्त व्यसन चरित्र" के माध्यम से सप्त व्यसनों के विभिन्न दोषों और उनके त्याग के महत्व का सुंदर विवेचन विभिन्न कहानियों के माध्यम से किया गया है। इस ग्रंथ में सप्त व्यसनों का स्वरूप व कुख्यात अधम पुरुषों का जीवन चरित्र है, भाषा अत्यंत सरल, सहज व रोचक है।  बालक से लेकर वृद्ध तक इसे आसानी से पढ़ सकते हैं। लघु काय होते हुए भी यह ग्रंथ अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यसनों में संलिप्त व्यक्तियों के लिए सन्मार्ग दर्शायक प्रकाश किरण के समान है तथा धर्म से पतित व्यक्तियों के लिए बैसाखी के समान है।

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क्षत्र चूड़ामणि ( chatra chudamani)

आचार्य श्री वादीभसिंह सूरि जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "क्षत्र चूड़ामणि" में णमोकार मंत्र की महिमा को जीवन्धर कुमार के माध्यम से दर्शाया है। जीवन्धर कुमार ने कुत्ते को णमोकार मंत्र सुनाया जिससे वह स्वर्ग में देव हुआ।
प्रस्तुत ग्रंथ मनोहारी, सुपाठ्य, गीयमान, अनेक नीति-रीति, कहावतों, मुहावरों, लोकोक्तियों और दृष्टांतों से परिपूरित है।
 इस ग्रंथ की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमे श्रृंगार रस का बाहुल्य और अलंकारों का अतिरेक नहीं है। यह ग्रंथ संक्षिप्त, सारगर्भित, सुगम, बोध गम्य एवं लुभाने वाला है।

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गौतम स्वामी चरित्र (Gautam Swami charitra)

मंडलाचार्य श्री धर्मचंद्र स्वामी जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "गौतम स्वामी चरित्र" भगवान महावीर स्वामी के मुख्य गणधर गौतम स्वामी के जीवन चरित्र पर आधारित है, जो उनके भूत-भविष्यत्-वर्तमान भवों को दर्शाता है। इसमे स्वर्ग, नरक और मध्यलोक की स्थिति, देव, तिर्यंच और मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति आदि का वर्णन श्रेष्ठतम रीति से किया गया है।
 इस ग्रंथ के स्वाध्याय से पाप भीरूता, सम्यक्त्व और चारित्र में दृढ़ता तथा निर्मलता आती है। यह महानता के संस्कारों का बीजरोपण करने का सर्वोत्तम उपाय है।

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श्री विमलनाथ पुराण (Shri Vimalnath Puraan)

ब्रह्मचारी कृष्णदास द्वारा रचित प्रस्तुत "विमलनाथ पुराण" 13वें तीर्थंकर श्री विमलनाथ जी के पूर्व भवों से लेकर वर्तमान भव तक वर्णन करते हुए उनके गुणों का गुणगान करता है। प्रस्तुत ग्रंथ को दस अध्यायों के माध्यम से प्रेषित किया गया है जिसमें चित्त को विशुद्ध करने वाली, निर्मल ध्यान को उत्पन्न करने वाली, ज्ञान और संयम-वैराग्य की उत्पत्ति में निमित्त बनने वाले चारित्रिक घटनाओं को सरल व सर्वोपयोगी शैली में वर्णन किया गया है।

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श्रेणिक चरित्र (shrenik charitra)

आचार्य श्री शुभचंद्र स्वामी जी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ "श्रेणिक चरित्र" के 15 अध्यायों में भगवान महावीर स्वामी की धर्म सभा के प्रमुख श्रोता, भविष्य काल के प्रथम तीर्थंकर राजा श्रेणिक का जीवन चरित्र अत्यंत रोचक व मनोहारी है। ग्रंथकार ने अत्यंत सरल सुबोधक अध्यायों के विभाजन के साथ-साथ छोटी-छोटी घटनाओं को विषयभूत करके भी पाठकों को शास्त्र के सार से जोड़ दिया है।
 इसमें दृश्य बहुत ही छोटे-छोटे होने से रुचि बनाए रखने में सक्षम हैं जिसे पाठक उपन्यास की तरह पूरा पढ़े बिना विराम नहीं लेंगे।

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चौबीसी पुराण

इस काल में हुए चौबीस तीर्थंकरों के जीवन चरित्र का कथन करने वाला ये चौबीसी पुराण आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा सम्पादित है; जो बहुत रोचक है।

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सुदर्शन चरित्र (sudarshan charitra)

प्रस्तुत ग्रंथ "सुदर्शन चरित्र" सेठ सुदर्शन को आधार बनाकर लिखा गया है। जिसमें उनकी णमोकार मंत्र पर दृढ़ श्रद्धा, मुनिराज की एक रात्रि में की गई वैय्यावृत्ति का फल व उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को लिपिबद्ध किया है।
 इस ग्रंथ की रचना भट्टारक श्री विद्यानंदी जी के द्वारा लगभग सन्  1593 में गंधारपुरी (सूरत) में स्थित जैन मंदिर में की गई थी। ग्रंथ का संपादन आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा किया गया है।                        नोट-इस ग्रंथ की सरल भाषा अल्पज्ञ व्यक्तियों के लिए भी रोचक शैली है जिससे स्वाध्यायार्थी आद्योपांत पढें बिना इस ग्रंथ को नहीं छोड़ता।

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चारुदत्त चरित्र (Charudutth Charitra)

ब्रह्मचारी नेमीदत्त द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ चारुदत्त चरित्र सरल हिंदी में रचित है जिसमें चारुदत्त नामक पात्र के उत्तम जीवन पर प्रकाश डाला है। मुख्य घटना इसमें चारुदत्त द्वारा बकरे को णमोकार मंत्र सुनाए जाने की है तथा इन दोनों की भूत-भविष्यत्-वर्तमान जीवन का वर्णन किया गया है।
इस ग्रंथ के माध्यम से अंतरंग में विद्यमान मिथ्यात्वादि अंधकार तिरोहित हो जाता है, जीवन में समता का भाव, संतोष वृत्ति एवं दुर्व्यसनों से मुक्त होने की अपूर्व ही प्रेरणा प्राप्त होती है।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री