Namo jinanam

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श्री आदिनाथ जी ( Shri Aadinath ji )

 श्री आदिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर हैं, इन्होंने वज्रनाभि  चक्रवर्ती की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। ये सर्वार्थसिद्धि से चयकर भरतक्षेत्र के अयोध्या नगरी के इक्ष्वाकु कुल के महाराजा अंतिम कुलकर नाभिराय की महारानी मरुदेवी के गर्भ में अवतरित हुए थे। इंद्रों ने गर्भ के 6 माह पूर्व व गर्भ के 9 माह इस प्रकार 15 माह तक रत्नवृष्टि की। मां मरु देवी ने 16 सपने देखे। महाराज नाभिराय ने क्रमशः सभी स्वप्नों का फल बताया।
 चैत्र वदि नवमी के शुभ दिन भगवान् का जन्म हुआ सौधर्म इंद्र ने ऐरावत हाथी द्वारा भगवान् को ले जाकर सुमेरु पर्वत की पांडुक शिला पर एक हजार आठ कलशों से भगवान् का अभिषेक क्षीरसागर के जल से किया। इनका विवाह कच्छ व महाकच्छ की बहनों यशस्वती व सुनंदा से हुआ था। महारानी यशस्वती ने प्रथम चक्रवर्ती भरत को तथा पुत्री ब्राह्मी को जन्म दिया तथा सुनंदा रानी ने प्रथम कामदेव बाहुबली तथा पुत्री सुंदरी को जन्म दिया।
 भगवान् ने ब्राह्मी व सुंदरी को अंक विद्या व लिपि विद्या का ज्ञान दिया व पुत्रों को विद्याएं पढ़ायी। कर्मभूमि के प्रारंभ होने पर भगवान् ने असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य तथा शिल्प इन षट्कर्मों का उपदेश दिया। क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन तीन वर्गों की स्थापना की। यह सब आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा को किया था अतः तभी से कृतयुग का प्रारंभ हुआ तथा भगवान् प्रजापति कहलाए ।
नीलांजना अप्सरा का नृत्य देखते हुए भगवान् वैराग्य को प्राप्त हुए, तभी पंचम स्वर्ग से लौकांतिक देवों ने भगवान् के वैराग्य की अनुमोदना की। दीक्षाभिषेक किया तथा भगवान् पालकी में आरूढ़ होकर सिद्धार्थ वन में पहुंचे, चैत्र कृष्ण नवमी को 4 हजार राजाओं के साथ दीक्षित हुए। दीक्षा का स्वरूप न जानने के कारण सभी राजा भ्रष्ट हो गए। दीक्षा लेते ही भगवान् को मन:पर्यय ज्ञान प्रकट हो गया।
 छह माह  बाद यतियों की  चर्या विधि बतलाने के उद्देश्य से आहार हेतु निकले, किंतु कोई आहार की विधि नहीं जानता था। छह माह और व्यतीत होने पर अर्थात् एक वर्ष बाद हस्तिनापुर नगरी पहुंचे, वहां के कुरुवंशीय राजा सोमप्रभ के छोटे भाई श्रेयांश ने जाति स्मरण द्वारा पूर्व में दिए गए आहार विधि के अनुसार भगवान् का इक्षुरस का आहार कराया।  देवों ने पंचाश्चर्य प्रकट किए।
  फाल्गुन कृष्ण एकादशी को भगवान् को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई चतुर्निकाय के देवों ने ज्ञान कल्याणक संपन्न किया। भगवान् के समवशरण में भरत चक्रवर्ती के अनुज वृषभसेन प्रथम गणधर हुए। मरीचि को छोड़कर सभी भ्रष्ट मुनियों ने भगवान् के समीप प्रायश्चित लेकर पुनः दीक्षा ग्रहण की।
 भगवान् के समवशरण  में वृषभसेन  आदि 84 गणधर थे, 4750 पूर्वधारी, 4150 शिक्षक,9000अवधिज्ञानी, 20000 केवलज्ञानी, 20600 विक्रियाॠद्धिधारी, 12750 मन:पर्ययज्ञानी तथा 12700 वादी इस प्रकार सब मिलाकर 84084 मुनिराज थे।
 ब्राह्मी को आदि लेकर 3 लाख आर्यिकाएं थीं। 3 लाख श्रावक तथा 5 लाख श्राविकाएं थीं। देव- देवियां तथा तिर्यंचों सहित सभी भगवान् के समवशरण में भगवान् की पूजा स्तुति करते थे। 
 कैलाश पर्वत पर माघ कृष्ण चतुर्दशी को अभिजित् नक्षत्र में पर्यंकासन से सूर्योदय के समय मोक्ष पद को प्राप्त किया। देवों ने मोक्ष कल्याणक की पूजा संपन्न की।

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श्री अजितनाथ जी (Shri Ajitnath Ji)

 श्री अजितनाथ भगवान् वर्तमान के दूसरे तीर्थंकर एवं चतुर्थकाल के प्रथम तीर्थंकर हैं। राजा विमलवाहन की पर्याय में इन्होंने तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंथ किया था। यह विजय नामक अनुत्तर विमान से च्युत होकर जेष्ठ माह की अमावस्या को इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्री राजा जितशत्रु की महारानी विजयसेना के गर्भ में आए थे। माता ने सोलह स्वप्न देखे थे। इनका जन्म माघ शुक्ल दशमी को हुआ था। भगवान् आदिनाथ स्वामी के मोक्ष जाने के पचास लाख करोड़सागर बीतने पर इनका जन्म हुआ था। इनकी आयु 72 लाख पूर्व की थी। शरीर की ऊंचाई 450 धनुष थी। शरीर का वर्ण स्वर्ण समान पीला था। आयु के चतुरांश बीतने पर इन्हें राज्य प्राप्त हुआ। एक लाख पूर्व कम अपनी आयु के तीन भाग तथा एक पूर्वांग तक इन्होंने राज्य किया। अस्थिर उल्का को देखकर वैराग्य हुआ। लौकांतिक देवों ने वैराग्य की अनुमोदना की। पुत्र अजितसेन को राज्य देकर सुप्रभा नामक पालकी में आरुढ़ होकर, सहेतुक वन में जाकर माघ कृष्ण नवमी के दिन सप्तपर्ण वृक्ष के समीप सांयकाल के समय 1000 राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की।  बेला का नियम पूर्ण होने पर ब्रह्मा राजा ने आहार दान दिया था। भगवान् 12 वर्ष तक छद्मस्थ अवस्था में रहे। पौष कृष्ण एकादशी को केवलज्ञान प्राप्त किया। सिंहसेन आदि 90 गणधर थे। 7750 पूर्वधारी, 21600 शिक्षक, 9400अवधिज्ञानी, 20000  केवलज्ञानी,   20400 विक्रियाऋद्धिधारी, 12450 मन:पर्ययज्ञानी तथा 12400 अनुत्तरवादी थे। कुल मिलाकर एक लाख तपस्वी थे। प्रकुब्जा आदि 320000 आर्यिकाएं थीं, तीन लाख श्रावक व पांच लाख श्राविकाएं  थीं। बारह सभाओं  से वेष्टित भगवान् ने धर्म का उपदेश दिया तथा चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन सम्मेदाचल से निर्वाण प्राप्त किया। इनके समय में सगर नाम के द्वितीय चक्रवर्ती हुए थे, उन्होंने भी मोक्ष पद को प्राप्त किया था।

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श्री संभवनाथ जी (Shri sambhav nath Ji)

 श्री संभवनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के तृतीय तीर्थंकर हैं, इन्होंने राजा विमलवाहन की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। ये प्रथम  ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान से च्युत होकर फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को श्रावस्ती नगरी के राजा दृढ़राज्य की महारानी सुषेणा के गर्भ में अवतरित हुए थे। इनका इक्ष्वाकु वंश व  काश्यप गोत्र था। इनका कार्तिक पूर्णिमा को जन्म हुआ। श्री अजितनाथ के मोक्ष जाने के बाद तीस लाख करोड़ सागर बीतने पर श्री संभवनाथ भगवान का जन्म हुआ था। इनकी आयु साठ लाख पूर्व की थी। शरीर की ऊंचाई 400 धनुष थी। आयु का चौथाई भाग बीतने पर राज्य की प्राप्ति हुई । 44 लाख पूर्व और 4 पूर्वांग व्यतीत होने पर मेघ विघटन से वैराग्य हुआ। सिद्धार्थ नामक पालकी में विराजमान होकर सहेतुक वन में 1000 राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा ग्रहण करते ही उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया। भगवान् का वर्ण सुवर्ण सदृश पीला था। श्रावस्ती नगरी के राजा सुरेंद्रदत्त ने इनका आहार कराया तभी पंचाश्चर्य प्रकट हुए।इनका छद्मस्थ काल 24 वर्ष का था। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन निर्मल केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञानकल्याणक का उत्सव मनाया गया। भगवान् के चारुषेण आदि 105 गणधर थे। 2150 पूर्वधारी तथा 15000 केवलज्ञानी इनके समवशरण में थे, तथा 19800 विक्रियाऋद्धिधारी,  12150 मन:पर्ययज्ञानी तथा 12000 वादियों से सुशोभित भगवान् थे। कुल मिलाकर भगवान् की धर्म सभा में 2 लाख मुनि तथा धर्मार्या को आदि लेकर 3 लाख 20000 आर्यिकाएं विराजमान थीं। भगवान् 34 अतिशयों तथा अष्ट प्रतिहार्यों से युक्त थे। 3 लाख श्रावक व 5 लाख श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवी तथा संख्यात तिर्यंच उनकी स्तुति करते थे। इन्होंने आयु के एक माह शेष रहने पर 1000 मुनिराजों के साथ प्रतिमा योग धारण किया। चैत्र शुक्ल षष्ठी के शुभ दिन भगवान् ने मोक्ष को प्राप्त किया, वे अष्टकर्म नष्ट कर अष्ट गुणों सहित अष्टम वसुधा के वासी हो गए।

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श्री अभिनंदननाथ जी (Shri abhinandan nath Ji)

श्री अभिनंदननाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के चतुर्थ तीर्थंकर हैं। राजा महाबल की पर्याय में इन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था।विजय नामक प्रथम अनुत्तर से चयकर ये अयोध्या नगरी के राजा स्वयंवर की पटरानी सिद्धार्था के गर्भ में वैशाख शुक्ल षष्ठी को अवतरित हुए। इनका इक्ष्वाकु वंश व काश्यप गोत्र था। माता सिद्धार्था ने सोलह सपने देखे थे। माघ शुक्ल द्वादशी के शुभ दिन भगवान् का जन्म हुआ। सौधर्मेंद्र सहित अनेक इंद्रों ने भगवान् का जन्माभिषेक महामहोत्सव सानंद संपन्न किया। श्री संभवनाथ भगवान् के 10 लाख करोड़ वर्ष का अंतराल बीतने पर अभिनंदननाथ भगवान् का जन्म हुआ था। भगवान् के दिव्य वस्त्राभूषण व भोजन स्वर्गों से आता था। भगवान् जन्म से ही तीन ज्ञान के धारी थे। इनकी आयु 50 लाख पूर्व की थी। शरीर की ऊंचाई 350 धनुष थी। इनका कुमार काल साढ़े 12 लाख पूर्व था। इनका राज्य काल साढ़े 36 लाख पूर्व था। आयु के 8 पूर्वांग शेष रहने पर मेघों की शोभा नष्ट होते देखकर भगवान् को आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर भगवान् की पूजा की तथा वैराग्य की अनुमोदना की। देवों ने मिलकर भगवान् का तप कल्याणक संपन्न किया। हस्तचित्रा नाम की पालकी में आरुढ़ होकर अग्र उद्यान में माघ शुक्ला दशमी के दिन 1000 राजाओं के साथ जिनदीक्षा ग्रहण की। अयोध्या नगरी के राजा इंद्रदत्त ने भगवान् को प्रथम आहार दिया। इनका छद्मस्थ काल 18 वर्ष था। पौष शुक्ल चतुर्दशी के दिन भगवान् को लोकालोक प्रकाशक निर्मल केवलज्ञान प्राप्त हुआ। सौधर्मेंद्र ने समवशरण की रचना करायी। उसमें वज्रनाभि आदि 103 गणधर थे। 2500 पूर्वधारी, 230050 शिक्षक, 9800 अवधिज्ञानी, 16000 केवलज्ञानी 19000 विक्रियाऋद्धिधारी, 11650 मन:पर्ययज्ञानी तथा 11000 प्रचंडवादी मुनिराज उस समवशरण में विराजमान थे। सब मिलाकर 3 लाख मुनि तथा मेरुषेणा को आदि लेकर  330600 श्राविकाएं थीं। 3 लाख श्रावक व  5 लाख श्राविकाएं थीं। भगवान् अभिनंदननाथ ने धर्म वृष्टि करते हुए आर्यखंड की वसुधा पर दूर-दूर तक विहार किया और वैशाख शुक्ल षष्ठी को सम्मेदाचल से मोक्ष को प्राप्त किया।

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श्री सुमतिनाथ जी (Shri sumatinath Ji)

श्री सुमतिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के पांचवे तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा रतिषेण की पर्याय में सोलहकारण भावनाओं को भाकर तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध किया था। वैजयंत विमान से चयकर अयोध्या नगरी के राजा मेघरथ की महारानी मंगला के गर्भ में श्रावण शुक्ल द्वितीया को आए थे। 15 माह तक निरंतर रत्नवृष्टि हुई तथा चैत्र शुक्ल एकादशी को भगवान् का जन्म हुआ। इनका सुमेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से 1008 कलशों के द्वारा जन्माभिषेक हुआ। वहीं इनका नाम 'सुमति' रखा गया। श्री अभिनंदननाथ भगवान् के बाद 9 लाख करोड़ सागर व्यतीत होने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु इसी अंतराल में शामिल थी। इनकी आयु 40 लाख पूर्व की थी। शरीर की ऊंचाई 300 धनुष की थी। इनका कुमार काल 10 लाख पूर्व था। राज्य काल 29 लाख पूर्व तथा 12 पूर्वांग था। संसार से विरक्त होकर अभय नाम की पालकी में बैठकर सहेतुक वन में वैशाख सुदी नवमी को दीक्षा ग्रहण की। सोमनस नगर के राजा पद्म ने नवधा भक्ति पूर्वक भगवान् का प्रथम आहार कराया। चैत्र शुक्ल एकादशी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इन्होंने 30 वर्ष छद्मस्थ अवस्था में व्यतीत किए। इनके अमर आदि 116 गणधर थे।  2400 पूर्वधारी, 254350 शिक्षक, 11000 अवधिज्ञानी, 13000 केवलज्ञानी, 8400 विक्रियाऋद्धिधारी तथा 10400 मन:पर्ययज्ञानी और 10450 वादी उनकी वंदना करते थे । कुल 320000 मुनि थे। अनंतमति आदि 330000 आर्यिकाएं 3 लाख श्रावक व 5 लाख आर्यिकाएं इनके समवशरण में शोभित हो रहे थे। भगवान् ने 18 क्षेत्रों में विहार कर भव्यजीवो को धर्म का उपदेश दिया था। आयु के एक माह शेष रहने पर 1000 मुनियों के साथ सम्मेदाचल पर प्रतिमायोग धारण किया। चैत्र शुक्ल एकादशी को निर्वाण को प्राप्त किया।

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श्री पद्मप्रभ जी (Shri padmaprabha ji)

श्री पद्मप्रभ भगवान् वर्तमान चौबीसी के छठवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा अपराजित की पर्याय में तीर्थंकर नाम प्रकृति का बंध किया था। यह उर्ध्व ग्रैवेयक के प्रीतिंकर विमान से चयकर  माता के गर्भ में आए थे। इनके पिता कौशांबी नगरी के राजा धरण तथा माता सुसीमा नाम की रानी थी। माघ कृष्ण षष्ठी को भगवान् माता के गर्भ में आए थे। कार्तिक माह की कृष्ण त्रयोदशी को भगवान् का जन्म हुआ था।
 श्री सुमतिनाथ भगवान की तीर्थ परंपरा के 90000 करोड़ सागर बीतने पर श्री पद्मप्रभु भगवान् का जन्म हुआ था। इनकी आयु 30 लाख पूर्व थी। इनके शरीर की ऊंचाई 250 धनुष थी। आयु के चौथाई भाग बीतने पर इन्होंने राज्य प्राप्त किया था। जिनकी आयु 16 पूर्वांग कम एक लाख पूर्व रह गई थी तब किसी समय दरवाजे पर बंधे हुए हाथी की दशा सुनने पर उन्हें वैराग्य हो गया। चतुर्निकाय देवों ने भगवान् का तप कल्याणक मनाया। भगवान्  ने निवृत्ति नामक पालकी में सवार होकर मनोहर नामक वन में बेला का नियम लेकर कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को 1000 राजाओं के साथ दीक्षा को धारण किया। वर्धमान नगर के राजा सोमदत्त ने भगवान् को आहार कराया। उन्होंने छद्मस्थ अवस्था में छ: माह व्यतीत किए।
 क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होकर चार घातिया कर्मों को नष्ट करके चैत्र पूर्णिमा को भगवान् को निर्मल केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उसी समय इंद्र ने आकर उनकी पूजा की। जगत का हित करने वाले भगवान् के वज्रचामर आदि 110 गणधर थे। 2300 पूर्वधारियों से युक्त थे।269000 शिक्षकों से उपलक्षित थे। 10000 अवधिज्ञानी तथा 12000 केवलज्ञानी उनके साथ थे। 16800 विक्रियाऋद्धिधारी तथा 10300 मन:पर्ययज्ञानी उनकी सेवा करते थे। 9600 वादी थे। सब मिलाकर 330000 मुनि सदा उनकी स्तुति करते थे। रात्रिषेणा को आदि लेकर 420000 आर्यिकाएं  सब ओर से उनकी स्तुति करती थीं। 3 लाख श्रावक और 5 लाख श्राविकाएं तथा असंख्यात देव- देवियां और संख्यात तिर्यंच उनके साथ थे। धर्म उपदेश द्वारा भव्यजीवों को मोक्ष मार्ग पर लगाते हुए भगवान् सम्मेद शिखर पहुंचे, 1000 मुनिराजों के साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को अष्ट कर्म नष्ट करके परम शाश्वत धाम मोक्ष पद को प्राप्त किया।

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श्री सुपार्श्वनाथ जी (Shri suparshvanath ji)

श्री सुपार्श्वनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के सातवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने पूर्व भव में राजा नंदिषेण की पर्याय में सोलह कारण भावना भाकर तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध किया था। मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमान का अहमिंद्र यहां से चयकर बनारस नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ की महारानी पृथ्वीषेणा के गर्भ में अवतरित हुए। माता पृथ्वीषेणा के आंगन में देव रूपी मेघों ने छ: माह तक रत्नों की वृष्टि की थी। भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के शुभ दिन भगवान् गर्भ में आए थे। महाराज सुप्रतिष्ठ से सोलह सपनों का फल जानकर रानी अत्यंत हर्षित हुई थी।
 ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री पद्मप्रभु भगवान् के बाद 9000 करोड़ सागर बीतने पर भगवान् सुपार्श्वनाथ का जन्म हुआ था। इनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित थी। इनकी आयु 20 लाख पूर्व की थी। शरीर की ऊंचाई 200 धनुष थी। कुमार काल के 5 लाख पूर्व व्यतीत होने पर राज्य स्वीकार किया। जब इनकी आयु 20 पूर्वांग कम 1 लाख पूर्व रह गई तब किसी समय का ऋतु परिवर्तन देखकर संसार की नश्वरता का चिंतन करने लगे। लौकांतिक देवों ने भगवान् के वैराग्य की अनुमोदना की। भगवान् मनोगति नाम की पालकी पर आरूढ़ होकर सहेतुक वन में गए तथा ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को बेला का नियम लेकर 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गये। सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने भगवान् का पड़गाहन किया।
 भगवान् का छद्मस्थ काल 9 वर्ष था। फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को केवलज्ञान प्राप्त किया।  बल को आदि लेकर 95 गणधरों से सदा गिरे रहते थे। 2030 पूर्वधारियों के अधिपति थे। 244920 शिक्षक थे, 9000 अवधिज्ञानी तथा 11000 केवलज्ञानी उनके सहगामी थे, 15300 विक्रियाऋद्धि के धारक, 9150 मन:पर्ययज्ञानी, 8600 वादी उनकी वंदना करते थे। सब मिलाकर वे 3 लाख मुनियों के स्वामी थे। मीनार्या  को आदि लेकर 330000 आर्यिकाएं थी। 3 लाख श्रावक तथा 5 लाख आर्यिकाएं थी। असंख्यात देव-देवियां तथा संख्यात तिर्यंच उनकी वंदना करते थे। भव्यजीवों को धर्म अमृत का पान करा कर जब आयु का एक माह शेष रह गया था तब भगवान् सम्मेद शिखर पहुंचे तथा 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण करके फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को विशाखा नक्षत्र सूर्योदय के समय लोक के अग्रभाग मोक्ष को प्राप्त किया। पुण्यवान् उत्तम कल्पवासी देवों ने निर्वाण कल्याणक मनाया तथा 'यहां निर्वाण क्षेत्र है' इस प्रकार सम्मेद शिखर को निर्वाण क्षेत्र ठहरा कर स्वर्ग की ओर प्रयाण किया।

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श्री चंद्रप्रभ जी (Shri chandraprabha ji)

श्री चंद्रप्रभ स्वामी वर्तमान चौबीसी के आठवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने महाराजा पद्मनाभ की पर्याय में दीक्षा ग्रहण करके तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंध किया था। भगवान् वैजयन्त विमान से चयकर चंद्रपुर नगर के राजा महासेन की महारानी लक्ष्मणा के गर्भ में चैत्र कृष्ण पंचमी को अवतरित हुए थे। इनका इक्ष्वाकु वंश तथा काश्यप गोत्र था। गर्भ में आने के छः माह पूर्व व गर्भ के नौ माह अर्थात् 15 माह तक निरंतर देवों द्वारा रत्नवृष्टि हुई थी।
 पौष कृष्ण एकादशी को शक्र योग में भगवान् का जन्म हुआ। सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक इंद्र द्वारा किया। इन्द्र ने त्रिलोकीनाथ के आगे 'आनंद' नामक नाटक किया। भगवान् सुपार्श्वनाथ के मोक्ष जाने के बाद 900 करोड़ सागर का अंतर बीत चुका तब चंद्रप्रभ भगवान् का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी  इसी अंतर में सम्मिलित थी। इनकी आयु 10 लाख पूर्व थी तथा शरीर की ऊंचाई 150 धनुष थी।  भगवान् का राज्याभिषेक 250000 पूर्व व्यतीत होने पर हुआ था। राज्यावस्था में 650000  तथा 24 पूर्वांग का समय व्यतीत होने पर दर्पण में मुख देखकर वैराग्य को प्राप्त किया। संसार की असारता का चिंतन किया। लौकांतिक देवों ने वैराग्य की अनुमोदना की। इंद्रों ने दीक्षा कल्याणक की पूजा की।
 भगवान्  विमला नाम की पालकी में बैठकर सर्वर्तुक वन में गए तथा बेला का नियम लेकर पौष कृष्ण एकादशी को अनुराधा नक्षत्र में 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। नलिन ग्राम में राजा सोमदत्त ने नवधा भक्ति पूर्वक आहार दान दिया। देवों पंचाश्चर्य प्रकट किए। थे जिनकल्प मुद्रा में 3 माह बिताकर दीक्षा वन में नाग वृक्ष के नीचे बेला का नियम लेकर स्थित हो गए।
 फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को सांय काल अनुराधा नक्षत्र में चार घातिया कर्मों का नाश करके सयोग केवली हो गए। बारह सभाओं के मध्य धर्म का विस्तार से दिव्य ध्वनि के रूप में उपदेश दिया। भगवान् के दत्त को आदि लेकर 93 गणधर थे। 2000  पूर्वधारी थे। 8000 अवधिज्ञानी थे, 200400 शिक्षक तथा 10000 केवलज्ञानी थे। 14000 विक्रियाऋद्धि -धारी, 8000 मन:पर्ययज्ञानी मुनि तथा 7600 वादी मुनिराजों के स्वामी थे। कुल मिलाकर मुनियों की संख्या 250000 थी। वरुणादि 380000 आर्यिकाएं  उनकी सदा स्तुति किया करती थीं। 3 लाख  श्रावक व 5 लाख श्राविकाएं उनकी पूजा करती थीं। असंख्यात देव- देवियां संख्यात तिर्यंच वहां उपस्थित थे।
श्री चंद्रप्रभ स्वामी आर्य देशों में विहार करते हुए सम्मेद शिखर पहुंचे, वहां 1000  मुनियों के साथ प्रतिमा योग ग्रहण किया। फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन ज्येष्ठा नक्षत्र में शरीर को नष्ट कर सिद्ध हो गए। देवों ने निर्वाण कल्याणक की पूजा की।

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श्री पुष्पदंत जी (Shri pushpadant ji)

श्री पुष्पदंत भगवान् ( श्री सुविधिनाथ भगवान्) वर्तमान चौबीसी के नौवें तीर्थंकर हैं। उन्होंने राजा महापद्म की पर्याय में तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंध किया था। ये प्राणत स्वर्ग से चयकर काकन्दी नगर में इक्ष्वाकुवंशीय  व काश्यप गोत्री राजा सुग्रीव की रानी जयरामा देवी के गर्भ में फाल्गुन कृष्ण नवमी को अवतरित हुए थे। माता ने 16 सपने देखे तथा उनका फल अवधिज्ञानी राजा सुग्रीव से जानकर अत्यंत प्रसन्न हुई थी।
 मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को जेत्र योग में भगवान् का जन्म हुआ। इन्द्रों ने देवों के साथ आकर सुमेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से भगवान् का जन्माभिषेक किया और जन्म कल्याणक को मनाया।
 चंद्रप्रभ भगवान् के बाद जब 90 करोड़ सागर का समय व्यतीत हुआ तब श्री पुष्पदंत नाथ भगवान् इस भरतक्षेत्र में अवतरित हुए थे। उनकी आयु इसी अंतर में शामिल है इनकी आयु 2 लाख पूर्व तथा शरीर की ऊंचाई 100 धनुष थी। 50 लाख पूर्व इनका कुमार काल था। राज्य काल के 50000 पूर्व और 20 पूर्वांग बीतने पर एक समय उल्कापात होते देखकर उन्हें वैराग्य हो गया। इस निमित्त से प्रतिबुद्ध होकर वे तत्वों का चिंतन करने लगे लौकांतिक देवों ने भगवान् की पूजा की। अपने पुत्र सुमति को राज्य सौंप कर भगवान् दीक्षा लेने को उद्धत हुए। सूर्यप्रभा नामक पालकी में बैठकर पुष्पक वन में पहुंचे तथा मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को बेला का नियम लेकर सांय काल में 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। दीक्षा लेते ही चौथा मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो गया। आहार हेतु शेलपुर नगर में प्रवेश किया, वहां राजा पुष्पमित्र ने आहार करा कर पंचाश्चर्य प्राप्त किए। छद्मस्थ अवस्था में तपस्या करते हुए 4 वर्ष व्यतीत हो गए। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को नाग वृक्ष के नीचे निर्मल केवलज्ञान प्राप्त किया।घातिया कर्मों के नष्ट होते ही अनंत चतुष्टय प्रकट हो गए। समवशरण में समस्त पदार्थों का निरूपण करने वाली दिव्य ध्वनि से सुशोभित हुए।
 भगवान् 7 ऋद्धियों के धारण करने वाले विदर्भ आदि 88 गणधरों सहित थे। 1100 श्रुतकेवलियों के स्वामी थे। 155500 शिक्षकों के रक्षक थे। 8400 अवधिज्ञानियों से सेवित थे। 7000 केवलज्ञानी, 13000 विक्रियाऋद्धि के धारी, 7500 मन:पर्ययज्ञानी तथा 6600 वादियों द्वारा उनके मंगलमय चरणों की पूजा होती थी। सब मिलाकर 2 लाख मुनियों के स्वामी थे। घोषार्या को आदि लेकर 380000 आर्यिकाएं 2 लाख श्रावक व 5 लाख श्राविकाएं,असंख्यात देव- देवियां व संख्यात तिर्यंचों से संपन्न थे। अनेक आर्य देशों में विहार कर सम्मेद शिखर पहुंचे और योग निरोध कर भाद्र शुक्ल अष्टमी के दिन मूल नक्षत्र में सांय काल के समय 1000 मुनियों के साथ मोक्ष को प्राप्त हो गए। देव- देवियों ने निर्वाण कल्याणक मनाया फिर स्वर्ग चले गए।

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श्री शीतलनाथ जी (Shri sheetal nath ji)

श्री शीतलनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के दसवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा पद्मगुल्म की पर्याय में तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध किया था। भगवान् आरण स्वर्ग से चयकर जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र संबंधी मलय नामक देश के भद्रपुर नगर के राजा दृढ़रथ की महारानी सुनंदा के गर्भ में चैत्र कृष्ण अष्टमी को अवतरित हुए थे। देवों ने आकर गर्भ कल्याणक की पूजा की।
 माघ कृष्ण द्वादशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री पुष्पदंत भगवान् के मोक्ष जाने के बाद 9 करोड़ सागर का अंतर बीत जाने पर भगवान् शीतलनाथ का जन्म हुआ था। उनकी आयु इसी में सम्मिलित थी। उनके जन्म लेने के पहले पल्य के चौथाई भाग तक धर्म-कर्म का विच्छेद रहा था। भगवान् के शरीर की कांति स्वर्ण के समान थी। आयु 1 लाख पूर्व तथा शरीर 90 धनुष ऊंचा था। आयु का चतुर्थ भाग व्यतीत होने पर राज्यभार को संभाला।
 एक समय विहार हेतु वन में गए वहां पाले के समूह, जो क्षण भर पहले समस्त पदार्थों को ढके हुए था शीघ्र ही नष्ट हो गया, इसे देख आत्मबोध को प्राप्त भगवान् चिंतन करने लगे  कि यदि कर्म विद्यमान है तो जीव को सुख कैसे मिल सकता है? पुत्र को राज्य देकर भगवान् शुक्रप्रभा पालकी में सवार होकर सहेतुक वन में पहुंचे। वहां वे माघ कृष्ण द्वादशी के दिन पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में बेला का नियम लेकर 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। अरिष्ट नगर में राजा पुनर्वसु ने भगवान् को खीर का आहार कराया। इनका छद्मस्थ काल 3 वर्ष था। पौष कृष्ण चतुर्दशी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। उसी समय आकर देवों ने ज्ञान कल्याणक की पूजा की। भगवान् के अनगार आदि 81 गणधर थे। 1400 पूर्व धारी थे। 59200 शिक्षक थे, 7200 अवधिज्ञानी, 7000 केवलज्ञानी तथा 12000 विक्रियाऋद्धिधारी मुनि थे, 7500 मन:पर्ययज्ञानी थे। इसी प्रकार कुल मिलाकर मुनियों की संख्या एक लाख थी। धरणा  आदि 380000 आर्यिकाएं उनके साथ थीं। 2 लाख श्रावक तथा 3 लाख श्राविकाएं उनकी अर्चना तथा स्तुति करती थीं। असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे। अनेक देशों में विहार करते हुए भगवान् सम्मेदशिखर पहुंचे और वहां एक माह का योग निरोध कर प्रतिमायोग धारण किया और 1000 मुनियों के साथ आश्विन शुक्ल अष्टमी के दिन पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में सांय काल को मोक्ष को प्राप्त किया। भगवान् शीतलनाथ के तीर्थ के अंतिम भाग में काल दोष से वक्ता, श्रोता और आचरण करने वाले धर्मात्मा लोगों का अभाव हो जाने से समीचीन जैन धर्म का नाश हो गया।

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श्री श्रेयांसनाथ जी (Shri shreyansnath ji)

 श्री श्रेयांसनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के ग्यारहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा नलिनप्रभ की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। भगवान् स्वर्ग से चयकर भरतक्षेत्र के सिंहपुर नगर के राजा विष्णु की महारानी सुनंदा के गर्भ में ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को अवतरित हुए थे। इन्द्रों ने  गर्भ कल्याणक मनाया। फाल्गुन कृष्ण एकादशी को विष्णु योग में तीन ज्ञान के धारी भगवान् का जन्म हुआ। सौधर्म इंद्र भगवान् को ऐरावत हाथी पर बिठाकर सुमेरु पर्वत पर अभिषेक के लिए लेकर गया व अभिषेक कर वहीं उनका 'श्रेयांश' नाम रखा। श्री शीतलनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के बाद जब 100 सागर तथा 6626000 वर्ष कम 1 सागर प्रमाण अंतराल बीत गया और आधा पल्य तक धर्म की परंपरा छुटी रही तब श्रेयांसनाथ भगवान् का जन्म हुआ। उनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित थी। भगवान् की कुल आयु 84 लाख वर्ष थी। शरीर सुवर्ण की कांति के समान तथा 80 धनुष ऊंचा था। कुमार काल 21 लाख वर्ष बीतने पर राज्य पद को प्राप्त किया। इन्होंने 42 लाख वर्ष तक राज्य किया। किसी दिन वसंत ऋतु का परिवर्तन देखकर भगवान् आत्मबोध को प्राप्त हुए। लोकांतिक देवों ने भगवान् की पूजा की। इंद्रों ने दीक्षा कल्याणक के समय होने वाला अभिषेक किया। भगवान् ने विमलप्रभा पालकी में सवार होकर मनोहर नामक उद्यान में बेला का नियम लेकर फाल्गुन कृष्ण एकादशी को एक हजार राजाओं के साथ श्रवण नक्षत्र में संयम धारण किया।
 सिद्धार्थनगर में राजा नंद ने भगवान् का नवधा भक्तिपूर्वक आहार कराया। इनका छद्मस्थ काल 2 वर्ष का था। माघ कृष्ण अमावस्या को तुम्बुरु वृक्ष के नीचे सांर काल को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। चतुर्निकाय देवों ने ज्ञान कल्याणक की पूजा की।
 भगवान् के दिव्य समवशरण में कुंथु आदि 77  गणधर, 1300 पूर्वधारी, 48200 शिक्षक, 6000 अवधिज्ञानी, 6500 केवलज्ञानी, 11000 विक्रियाऋद्धिधारी, 6000 मन:पर्ययज्ञानी तथा 5000 मुख्य वादी मुनिराज थे। सब मिलाकर 84000 मुनि थे। धारणा आदि 120000 आर्यिकाएं थीं। 2 लाख श्रावक व 4 लाख श्राविकाएं थीं। असंख्यात  देव -देवियां तथा संख्यात तिर्यंच सदा उनके साथ रहते थे। धर्मोपदेश करते हुए अनेक देशों में विहार किया तथा सम्मेद शिखर पहुंचकर एक माह तक योग निरोध कर 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया। श्रावण पूर्णिमा को धनिष्ठा नक्षत्र में परम मोक्ष पद को प्राप्त किया। देवों ने मोक्ष कल्याणक मनाया।
श्री श्रेयांसनाथ भगवान् के तीर्थ काल में त्रिपृष्ठ नामक नारायण हुआ जो कि सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव नाम का प्रतिनारायण हुआ वह भी सप्तम नरक गया तथा विजय नाम के बलभद्र हुए और उन्होंने संयम धारण करके परम पद मोक्ष को प्राप्त किया।

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श्री वासुपूज्य जी (Shri vasupujya ji)

श्री वासुपूज्य भगवान् वर्तमान चौबीसी के बारहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा पद्मोत्तर की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। यह महाशुक्र स्वर्ग से चयकर भरत क्षेत्र के चंपानगर के अंग देश के राजा वसुपूज्य की महारानी जयावती के गर्भ में आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के दिन अवतरित हुए। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री श्रेयांसनाथ भगवान् के तीर्थ से 54 सागर प्रमाण अंतर बीत चुका था और अंतिम पल्य के तृतीय भाग में जब धर्म की संतति का छेद हो गया था तब वासुपूज्य भगवान् का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी में सम्मिलित थी। भगवान् की आयु 7200000 वर्ष की थी, शरीर की ऊंचाई 70 धनुष थी और कुमकुम के समान शरीर की कांति थी। कुमार काल के 1800000 वर्ष बीतने पर संसार से विरक्त होकर भगवान् तत्व चिंतन करने लगे। लौकांतिक देवों ने भगवान् की पूजा स्तुति की। दीक्षा के समय होने वाला अभिषेक देवों ने किया पालकी में सवार होकर मनोहर उद्यान में गए, बेला का नियम लेकर फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को सांयकाल विशाखा नक्षत्र में दीक्षा धारण की। उनके साथ 676 राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की। आहार हेतु महानगर में प्रवेश किया वहां राजा सुंदर ने उन्हें आहार दिया।
 इनका छद्मस्थ काल 1 वर्ष का था। कदंब वृक्ष के नीचे माघ शुक्ल द्वितीया को केवलज्ञान प्राप्त किया। 'धर्म' को आदि लेकर 66 गणधर थे। 1200  पूर्वधारी, 39200 शिक्षकमुनि, 5400 अवधिज्ञानी, 6000 केवलज्ञानी, 10,000 विक्रियाऋद्धिधारी, 6000 मन:पर्ययज्ञानी तथा 4200 वादी।इस प्रकार सब मिलाकर 72000 मुनियों से भगवान् सुशोभित होते थे। 'सेना' को आदि लेकर 106000 आर्यिकाएं, दो लाख श्रावक चार लाख श्राविकाएं, असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंचों से वे स्तुत्य थे। धर्मवृष्टि करते हुए आर्य क्षेत्रों में विहार करते हुए क्रम- क्रम से चंपा नगरी में आकर 1000 वर्ष रहे। आयु की 1 माह शेष रहने पर योग निरोध कर रजतमालिका नदी के किनारे की भूमि पर वर्तमान मंदारगिरी के शिखर पर मनोहर उद्यान में पर्यंकासन से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को सांयकाल विशाखा नक्षत्र में 94 मुनियों के साथ निर्वाण को प्राप्त किया। सेवा में निपुण देवों ने निर्वाण कल्याण की पूजा की। 
श्री वासुपूज्य भगवान् बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर हुए। इनके तीर्थ काल में  द्विपृष्ठ नामक अर्द्धचक्री नारायण हुआ, वह सप्तम नरक गया। अचल नामधारी बलभद्र हुए, वे संयम धारण कर निर्वाण को प्राप्त हुए तथा तारक नामक प्रतिनारायण सप्तम नरक गए।

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श्री विमलनाथ जी (Shri vimalnath ji)

श्री विमलनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के तेरहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा पद्मसेन की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। यह सहस्रार स्वर्ग से चयकर भरतक्षेत्र की कांपिल्य नगर के राजा कृतवर्मा की महारानी जयश्यामा के ज्येष्ठ कृष्णा दशमी को उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में गर्भ में अवतरित हुए। माघ शुक्ल चतुर्थी ( ख.ग.प्रति के पाठ की अपेक्षा चतुर्दशी के दिन) तीन जगत के स्वामी का जन्म हुआ।
 भगवान् वासुपूज्य के तीर्थ के बाद 30 सागर बीत गए और पल्य के अंतिम भाग में धर्म का विच्छेद हो गया तब श्रीविमलनाथ भगवान् का जन्म हुआ। उनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित है। भगवान् की आयु 60 लाख वर्ष थी, शरीर 60 धनुष ऊंचा था, शरीर की कांति स्वर्ण के समान थी। इनका कुमार काल 1500000 वर्ष प्रमाण था। राज्य करते हुए जब 3000000 वर्ष व्यतीत हो गए तब एक दिन हेमंत ऋतु में बर्फ की शोभा को तत्क्षण विलीन होते देखकर वैराग्य को प्राप्त हुए। लौकांतिक देवों ने भगवान् का स्तवन किया तथा अन्य देवों ने भी आकर तप कल्याणक में होने वाला अभिषेक का उत्सव किया। भगवान् देवदत्ता पालकी में सवार होकर सहेतुक वन में बेला का नियम लेकर माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन सायंकाल में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। नंदपुर नगर के राजा कनकप्रभ ने आहार दान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए। इनका छद्मस्थ काल 3 वर्ष रहा। माघ शुक्ल षष्ठी के दिन केवलज्ञान को प्राप्त किया। भगवान् के समवशरण में मंदर आदि 55 गणधर, 1100 पूर्वधारी, 36530 शिक्षक, 4800 अवधिज्ञानी, 5500 केवलज्ञानी, 9000 विक्रियाऋद्धिधारी, 5500 मन:पर्ययज्ञानी तथा 3600 वादी इस प्रकार 68000 मुनि  सदा उनकी स्तुति करते थे। पद्मा को आदि लेकर 130000 आर्यिकाओं, 2 लाख श्रावक, 4 लाख श्राविकाओं, असंख्यात देव- देवियों तथा संख्यात तिर्यंच से वे सहित थे। अंत में सम्मेद शिखर में 8600 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को उत्तराषाढ़ नक्षत्र में प्रातः काल मोक्ष धाम को प्राप्त किया।
 भगवान् विमलनाथ के तीर्थ में 'धर्म' नाम के बलभद्र हुए, जिन्होंने भगवान् के समवशरण में दीक्षा ग्रहण की व मोक्ष पद को प्राप्त हुए तथा स्वयंभू नामक नारायण व मधु नामक प्रतिनारायण हुए, दोनों ही सप्तम नरक गए।

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श्री अनंतनाथ जी (Shri anantnath ji)

 श्री अनंतनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के चौदहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा पद्मरथ की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। भगवान् अच्युत स्वर्ग से चयकर भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा सिंहसेन की महारानी जयश्यामा के गर्भ में कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा को अवतरित हुए थे। गर्भ में आने के 6 माह पूर्व देवों द्वारा रत्नवृष्टि की गयी। माता ने 16 स्वप्न देखे तथा देवों ने गर्भ कल्याणक की भव्य पूजा की। ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री विमलनाथ भगवान् के बाद 9 सागर और पौन पल्य बीत जाने पर अंतिम समय में धर्म का विच्छेद हो जाने पर श्री अनंतनाथ भगवान् का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। इनकी आयु इसी अंतराल में शामिल थी। उनकी आयु 300000 वर्ष की थी, शरीर की ऊंचाई 50 धनुष थी, 750000 वर्ष बीतने पर भगवान् का राज्याभिषेक हुआ था। जब राज्य करते हुए 1500000 वर्ष हुए तब उल्कापात देखकर आत्मबोध को प्राप्त हुए। देवों ने दीक्षा कल्याणक की पूजा की।
 भगवान् सागरदत्त नामक पालकी पर सवार होकर सहेतुक वन में पहुंचे वहां बेला का नियम लेकर ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन सायं काल को 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हुए। साकेत नगर के राजा विशाल ने भगवान् को प्रथम आहार कराया इनका छद्मस्थ काल 2 वर्ष था सहेतुक वन में अश्वस्थ- पीपल वृक्ष के नीचे चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन सायं काल में रेवती नक्षत्र में केवलज्ञान की भगवान् को प्राप्ति हुई। देवों ने ज्ञान कल्याणक की पूजा की।
 'जय' को आदि लेकर 50 गणधर थे। 1000 पूर्वधारी, 3200 वादी, 39500 शिक्षक, 4300 अवधिज्ञानी, 5000 केवलज्ञानी, 8000 विक्रियाऋद्धिधारी, 5000 मन:पर्ययज्ञानी मुनिराज थे, सब मिलाकर 66000  मुनि समवशरण में भगवान् के साथ विद्यमान थे। 'सर्वश्री' को आदि लेकर 108000 आर्यिकाओं का समूह था। 2 लाख श्रावक तथा 4 लाख श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवी व संख्यात तिर्यंच वहां रहते थे। अंत में भगवान् सम्मेद शिखर पहुंचे और 1 माह का योग निरोध कर 6100 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा चैत्र अमावस्या के दिन मोक्ष को प्राप्त किया।            श्री अनंतनाथ भगवान् के समय में सुप्रभ नाम के बलभद्र हुए उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया। पुरुषोत्तम नाम के नारायण हुए वे सप्तम नरक गए तथा मधुसूदन नाम के प्रतिनारायण भी नरकगामी हुए।

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श्री धर्मनाथ जी (Shri dharamnath ji)

श्री धर्मनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के पंद्रहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा दशरथ की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। यह सर्वार्थसिद्धि से चयकर भरतक्षेत्र के रत्नपुर नगर के कुरूवंशी काश्यपगोत्री महाराज भानु की महारानी सुप्रभा के गर्भ में वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को अवतरित हुए थे।
 माघ शुक्ल त्रयोदशी को गुरुयोग में भगवान् का जन्म हुआ। इंद्र ने सुमेरु पर्वत पर स्वर्ण कलशों द्वारा क्षीरसागर के जल से उनका अभिषेक किया तथा हर्ष से धर्मनाथ नाम रखा।
श्री अनंतनाथ भगवान् के बाद चार सागर प्रमाण व्यतीत होने पर अंतिम पल्य का जब आधा भाग धर्म रहित हो गया तब धर्म का विच्छेद हो गया। उनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित थी। उनकी आयु 1000000 वर्ष थी। शरीर की कांति स्वर्ण के समान तथा शरीर की ऊंचाई 180 हाथ थी। कुमार काल के ढाई लाख वर्ष बीतने पर राज्य की प्राप्ति हुई। राज्य काल 500000 वर्ष प्रमाण था, उसके बीतने पर उल्कापात देखकर भगवान् को वैराग्य हो गया।
 लौकांतिक देवों ने भगवान् की भक्ति स्तुति की। नागदत्ता नाम की पालकी में आरूढ़ होकर सालवन के उद्यान में बेला का नियम लेकर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन सांय काल में पुष्य नक्षत्र में 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। दीक्षा लेते ही मन:पर्यय नामक चौथा ज्ञान प्रकट हो गया। पाटलिपुत्र के राजा धन्यषेण ने उत्तम पात्र को आहार दान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए।
 इनका छद्मस्थ काल 1 वर्ष का था। सप्तछद वृक्ष के नीचे पौष पूर्णिमा की सांय काल पुष्य नक्षत्र में केवलज्ञान को प्राप्त किया।देवों ने चतुर्थ ज्ञान कल्याणक की पूजा की। भगवान् के समवशरण में अरिष्टसेन को आदि लेकर 43 गणधर थे, 911 पूर्वधारी तथा 40700 शिक्षकों से सहित थे। 3600 अवधिज्ञानी, 4500 केवलज्ञानी, 7000 विक्रियाऋद्धिधारी, 4500 मन:पर्ययज्ञानी, 2800 वादी इस प्रकार सब मिलाकर 64000 मुनि उनके साथ रहते थे। 'सुव्रता' को आदि लेकर 62400 आर्यिकाएं, दो लाख श्रावक व चार लाख श्राविकाएं, असंख्यात देव- देवी  तथा संख्यात तिर्यंच से भगवान् सेवित थे।
 अंत में सम्मेद शिखर पर एक माह का योग निरोध कर 809 मुनियों के साथ ध्यानारूढ़ हो गए। ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी को मोक्ष प्राप्त किया। धर्मनाथ भगवान् के तीर्थ में पुरुषसिंह नामक नारायण हुए, वे सातवें नरक गये। मधुक्रीड नामक प्रतिनारायण हुए, उन्होंने नरक को प्राप्त किया तथा सुदर्शन नामक बलभद्र हुए, उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया।
 इन्हीं के तीर्थ में मघवा नामक चक्रवर्ती हुए, उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया उनके पश्चात् सनत्कुमार नामक चौथे चक्रवर्ती हुए, उन्होंने भी मोक्ष प्राप्त किया

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श्री शांतिनाथ जी (Shri shantinath ji)

श्री शांतिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के सोलहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा मेघरथ के पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। यह सर्वार्थसिद्धि से चयकर कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर नगरी के काश्यपगोत्री राजा विश्वसेन की महारानी ऐरा के गर्भ में भाद्रपद कृष्ण सप्तमी के दिन अवतरित हुए थे। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को साम्ययोग में प्रातःकाल इनका जन्म हुआ। चतुर्निकाय के देवों ने मिलकर भगवान् का जन्म उत्सव मनाया। भगवान् धर्मनाथ जी के मोक्ष से जाने के बाद पौन पल्य कम तीन सागर बीत जाते पर पाव पल्य तक धर्म का विच्छेद हो जाने होने पर भगवान् श्री शांतिनाथ का जन्म हुआ था। उनकी आयु इसी अंतराल में शामिल थी। उनकी आयु 100000 वर्ष की थी। शरीर की ऊंचाई 40 धनुष थी। शरीर की कांति स्वर्ण के समान थी। कुमार काल के 25000 वर्ष व्यतीत होने पर यह राज्य पद पर आरुढ़ हुए। राज्यावस्था के 25000 वर्ष व्यतीत होने पर भगवान् को 14 रत्न व नौ निधियों की प्राप्ति हुई। चक्रवर्ती अवस्था में 25000 वर्ष और निकल गए तब एक बार अलंकार धारण करते समय दर्पण में अपने दो मुख देखकर आत्मबोध को प्राप्त हुए। तत्वचिंतन करने लगे तभी लौकांतिक देवों ने आकर भगवान् की पूजा स्तुति की। उन्होंने अपना राज्य नारायण नामक पुत्र को दिया तभी देवों ने दीक्षा अभिषेक किया।
 सर्वार्थसिद्धि नाम की पालकी में आरुढ़ होकर भगवान् सहसाम्रवन में पहुंचे तथा बेला का नियम लेकर ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को भरणी नक्षत्र में दीक्षा को ग्रहण किया। तुरंत ही मन:पर्ययज्ञान हो गया। चक्रायुध को आदि लेकर 1000 राजा भी भगवान् के ही साथ दीक्षित हो गए। 16 वर्ष का छद्मस्थ काल था। मंदिरपुर के राजा सुमित्र ने आहार दान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए।
 पौष शुक्ल दशमी के दिन नंद्यावर्त वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। भगवान् के समवशरण में चक्रायुध को आदि लेकर 36 गणधर थे। 800 पूर्वधारी, 41800 शिक्षक, 3000 अवधिज्ञानी, 4000 केवलज्ञानी 6000  विक्रियाऋद्धिधारी, 4000 मन:पर्ययज्ञानी तथा 2400 वादी इस प्रकार 62000 मुनिराज थे तथा हरिषेणा आदि 60300  आर्यिकाएं, सुरकीर्ति को आदि लेकर 200000 श्रावक तथा अर्हद्दासी को आदि लेकर 400000 श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवी तथा संख्यात तिर्यंच थे। 
धर्मोपदेश करते हुए आयु का एक माह शेष रहने पर भगवान् सम्मेद शिखर पहुंचे तथा अचल योग में विराजमान हो गए। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को योग निरोध कर अयोग केवली अवस्था को प्राप्त हुए।चक्रायुध  को आदि लेकर 9000 मुनि भी भगवान् की भांति मोक्ष को प्राप्त हुए। 
श्री शांतिनाथ भगवान् ने जो मोक्षमार्ग प्रकट किया वह बिना किसी बाधा के अपनी अवधि को प्राप्त हुआ अर्थात् अब धर्म विच्छेद नहीं होता था, वह अब निराबाध रूप से चलने लगा।

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श्री कुंथुनाथ जी(SHRI KUNTHU NATH JI)

    (उत्तर पुराण के अनुसार)
श्री कुंथुनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के सत्रहवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा सिंहरथ की पर्याय में सोलहकारण भावनाएं भाकर तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति का बंध किया था। यह सर्वार्थसिद्धि से चयकर कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर के कौरववंशीय काश्यपगोत्री महाराज सूरसेन की पट्टरानी श्रीकांता के गर्भ में श्रावण कृष्ण दशमी के दिन रात्रि के पिछले पहर में अवतरित हुए।
 भगवान् का जन्म वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के शुभ दिन हुआ था। श्री शांतिनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के बाद आधा पल्य व्यतीत होने पर कुंथुनाथ भगवान् का जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी अंतराल में सम्मिलित थी। भगवान् की आयु 95000 वर्ष थी। 35 धनुष ऊंचा शरीर था तथा तपाए हुए स्वर्ण सदृश उनके शरीर की कांति थी। कुमार काल 25750 वर्ष का था। राज्यावस्था में जब 23750 वर्ष व्यतीत हुए तब उन्हें अपनी जन्मतिथि के दिन चक्रवर्ती की निधि प्राप्त हुई थी। इतने ही वर्ष और राज्यावस्था में व्यतीत होने पर अपने पूर्व भव का स्मरण होने से वैराग्य उत्पन्न हो गया। लोकतांत्रिक देवों ने आकर भगवान् का स्तवन किया तथा दीक्षा कल्याणक मनाया। भगवान् 
विजिया नामक पालकी में सवार होकर सहेतुकवन में पहुंचे। वहां बेला का नियम लेकर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन कृतिका नक्षत्र में सांयकाल 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हुए। उसी समय इन्हें मन:पर्ययज्ञान भी प्रकट हो गया। हस्तिनापुर के राजा धर्ममित्र ने भगवान् को आहार दान दिया। इनका छद्मस्थ काल 16 वर्ष का था। चैत्र शुक्ला तृतीया को भगवान् को निर्मल केवल ज्ञान प्रकट हो गया। 
स्वयंभू को आदि लेकर इनके 35 गणधर थे, 700 पूर्वधारी, 43150 मर्मभेदी शिक्षक,  2500 अवधिज्ञानी, 3200 केवलज्ञानी, 5100 विक्रियाऋद्धिधारी, 3300 मन:पर्ययज्ञानी, 2050 वादी मुनिराज थे, इस प्रकार सब मिलाकर 60000 मुनिराज उनके साथ थे।
 भाविता को आदि लेकर 60350 आर्यिकाएं, 300000  श्राविकाएं तथा 200000 श्रावक थे। असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे। भगवान् दिव्यध्वनि द्वारा अनेकों देशों में विहार करते हुए जब आयु 1 माह शेष रह गई तब सम्मेद शिखर पहुंचें वहां 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया। वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को कृतिका नक्षत्र में भगवान् ने मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने मोक्ष कल्याणक की पूजा की।

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श्री अरनाथ जी(SHRI Ar NATH JI)

  (उत्तर पुराण के अनुसार) 
श्री अरनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के अठारहवें तीर्थंकर हैं। उन्होंने राजा धनपति की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। भगवान् जयन्त विमान से चयकर कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर नगरी के सोमवंशीय तथा काश्यपगोत्री राजा सुदर्शन की महारानी मित्रसेना के गर्भ में फागुन कृष्ण तृतीया को अवतरित हुए थे।
  रानी मित्रसेना ने मृगशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को पुष्य नक्षत्र में तीन ज्ञान के धारी पुत्र को जन्म दिया। श्री कुंथुनाथ भगवान् के  मोक्ष जाने के बाद, जब 1000 करोड़ वर्ष कम पल्य का चौथाई भाग बीत गया, तब भगवान् का जन्म हुआ था। उनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित है। भगवान् की आयु 84000 वर्ष तथा शरीर की ऊंचाई  30 धनुष थी। शरीर की कांति सुवर्ण सदृश थी। कुमारावस्था के 21000 वर्ष बीतने पर इन्हें राज्य की प्राप्ति हुई थी।
राज्यावस्था के 21000 वर्ष व्यतीत होने पर चक्रवर्ती पद की प्राप्ति हुई थी। जब आयु का तीसरा भाग बाकी रह गया, तब शरद ऋतु  के मेघों का विघटन देखकर इन्हें आत्मबोध हो गया। लौकांतिक देवों ने भगवान् के विचार का समर्थन कर उन्हें प्रतिबोधित किया।
 'वैजयंती' पालकी में सवार होकर सहेतुक वन में तेला का नियम लेकर मार्गशीर्ष शुक्ला दशमी के दिन रेवती नक्षत्र में 1000 राजाओं के साथ दीक्षा धारण की।चक्रपुर नगर के राजा अपराजित ने भगवान् को आहार दान दिया। इनका  छद्मस्थ काल 16 वर्ष का था। कार्तिक शुक्ला द्वादशी को घातीया कर्मों को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त किया।
 भगवान् के समवशरण में कुंभार्य को आदि लेकर 30 गणधर थे। 610 पूर्वधारी,  35835 शिक्षक, 2800 अवधिज्ञानी, 2800 केवलज्ञानी, 4300 विक्रियाऋद्धिधारी, 2055 मन:पर्ययज्ञानी तथा 1600 श्रेष्ठ वादी थे, सब मिलाकर 50,000 मुनिराज भगवान् के साथ रहते थे।
 यक्षिला को आदि लेकर 60000 आर्यिकाएं थीं। 100000 श्रावक तथा 300000 श्राविकाएं थीं।  असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे।
 धर्मोपदेश करते हुए भगवान् ने अनेक देशों में विहार किया। जब उनकी आयु 1 माह शेष रह गई तब उन्होंने सम्मेद शिखर पर 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन रेवती नक्षत्र में रात्रि के पूर्व भाग में मोक्ष प्राप्त किया। इंद्रों ने आकर निर्वाण कल्याणक की पूजा की।
 भगवान् अरनाथ के तीर्थ में 'सुभौम' नामक चक्रवर्ती हुआ था, रसना इंद्रिय के लोभ के कारण उसे नरक का वासी होना पड़ा। सुभौम चक्रवर्ती के बाद 600 करोड़ वर्ष बीतने पर 'नंदिषेण' नाम के छठवें बलभद्र हुए, उन्होंने मोक्ष को प्राप्त किया। 'पुण्डरीक' नामक नारायण हुए, वे अति परिग्रह व आरंभ के कारण छठवें नरक गए तथा 'निशंभु' नामक प्रतिनारायण हुआ, वह भी नरकगामी हुआ।

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श्री मल्लिनाथ जी(SHRI Malli NATH JI)

  (उत्तर पुराण के अनुसार)
श्री मल्लिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के उन्निसवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा वैश्रवण की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। भगवान् अनुत्तर विमान से चयकर भरतक्षेत्र के बंग देश के मिथिला नगरी के इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्री राजा कुंभ की महारानी प्रजावती के गर्भ से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को अश्विनी नक्षत्र में अवतरित हुए थे। मृगशीर्ष सुदी एकादशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री अरनाथ भगवान् के बाद एक हजार करोड़ वर्ष बीतने पर श्री मल्लिनाथ भगवान्  हुए। इनकी आयु भी इसी अंतराल में शामिल है।
 भगवान् की आयु 55000 वर्ष की थी। शरीर की ऊंचाई 25 धनुष थी। स्वर्ण सदृश शरीर की कांति थी। कुमार काल के 100 वर्ष बीतने पर 1 दिन भगवान् ने देखा सारा नगर उनके विवाह के लिए सजाया जा रहा है तभी उन्हें अपने पूर्व जन्म के अपराजित विमान का स्मरण हो आया, तभी वे विवाह की निंदा करते हुए विरक्त होकर दीक्षा लेने को उद्धत हुए। लौकांतिक देवों ने भगवान् की स्तुति की। दीक्षा संबंधी अभिषेक हुआ। भगवान् जयंत नामक पालकी में आरूढ़ होकर श्वेत वन के उद्यान में पहुंचे। मार्गशीर्ष सुदी एकादशी को 300 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। मिथिला पुर के राजा नंदिषेण के आहार दान दिया। इनका छद्मस्थ काल 6 दिन था। मार्गशीर्ष सुदी एकादशी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके समवशरण में विशाख को आदि लेकर 28 गणधर थे। 550 पूर्वधारी, 29000 शिक्षक, 2200 अवधिज्ञानी, 2200 केवलज्ञानी, 1400 वादी, 2900 विक्रियाऋद्धिधारी तथा 1750 मन:पर्ययज्ञानी, इस प्रकार सब मिलाकर 40,000 मुनि उनके साथ थे।
 बंधूसेना को आदि लेकर 55000 आर्यिकाएं थीं। एक लाख श्रावक तथा तीन लाख श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवियां व संख्यात तिर्यंच थे। एक माह की आयु शेष रहने पर सम्मेदाचल पर 5000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा फाल्गुन शुक्ला सप्तमी को भरणी नक्षत्र में मोक्ष पद प्राप्त किया।
 इन्हीं के तीर्थ में 'पद्म' नाम के चक्रवर्ती हुए, उन्होंने मोक्ष पद प्राप्त किया तथा श्री मल्लिनाथ भगवान् के तीर्थ में ही सातवें बलभद्र 'नंदिषेण' हुए, उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया तथा नारायण 'दत्त' जो कि सप्तम नरक गया।  'बलिन्द्र' नामक प्रतिनारायण हुआ, वह भी नरक गया।

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श्री मुनिसुव्रतनाथ जी(SHRI Munisuvrat NATH JI)

   (उत्तर पुराण के अनुसार) 
 श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के बीसवें तीर्थंकर है। इन्होंने राजा हरिवर्मा की पर्याय में तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति का बंध किया था। यह प्राणत स्वर्ग से चयकर राजगृही नगरी के हरिवंशीय काश्यपगोत्री राजा सुमित्र की महारानी सोमा के गर्भ में श्रावण कृष्ण द्वितीया को अवतरित हुए।
 श्री मल्लिनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के बाद 5400000 वर्ष बीतने पर श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान् का जन्म हुआ। इनकी आयु भी इसी अंतराल में शामिल है। भगवान् की आयु 30000 वर्ष थी। शरीर की ऊंचाई भी  20 धनुष थी तथा शरीर की कांति मयूर के कण्ठ के समान नीली थी।
 कुमार काल के 7500 वर्ष व्यतीत होने पर इनका राज्याभिषेक हुआ। राज्यावस्था में 15000 वर्ष बीतने पर एक दिन उनके यागहस्ती ने ग्रास खाना छोड़ दिया, उसका पूर्व भव का स्मरण कर भगवान् आत्मबोध को प्राप्त हो गए। लौकांतिक देवों ने भगवान् के विचारों का समर्थन किया। भगवान् का दीक्षा कल्याणक मनाया गया।
 'अपराजित' नाम की पालकी में सवार होकर 'नील' नामक वन में बेला का नियम लेकर वैशाख कृष्ण दशमी को श्रवण नक्षत्र में 1000 राजाओं के साथ दीक्षा को ग्रहण किया। सौधर्मेंद्र ने भगवान् के बालों का समूह क्षीरसागर में भेज दिया। दीक्षा लेते ही उन्हें मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो गया। राजगृही के राजा वृषभसेन ने भगवान् को आहार दान दिया।
 छद्मस्थ काल के 11 माह बीतने पर वैशाख कृष्ण नवमी को चंपक वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। इंद्रों ने ज्ञान कल्याणक महोत्सव संपन्न किया। भगवान् के समवशरण में 'मल्लि' को आदि लेकर 18 गणधर थे।  500 पूर्वधारी, 21000 शिक्षक, 1800 केवलज्ञानी, 1800  अवधिज्ञानी, 2200 विक्रियाऋद्धिधारी, 1500 मन:पर्ययज्ञानी तथा 1200 वादी, इस प्रकार कुल मिलाकर 30,000 मुनिराज थे। पुष्पदंता को आदि लेकर 50000 आर्यिकाएं थीं। इस तरह 100000 श्रावक और 300000 श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे।
 आयु का 1 माह शेष रहने पर सम्मेदाचल जाकर 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग धारण किया तथा फाल्गुन कृष्ण द्वादशी को मोक्ष प्राप्त किया।
इन्हीं के तीर्थ में 'हरिषेण' नामक चक्रवर्ती हुए थे। उन्होंने संयम धारण किया और सर्वार्थसिद्धि  में अमहिंद्र हुए। इन्हीं के तीर्थ में आठवें बलभद्र 'श्री रामचंद्र जी' हुए, उन्होंने मोक्ष पद को प्राप्त किया। 'लक्ष्मण' नाम का नारायण तथा 'रावण' नाम का प्रति नारायण हुए हैं जो कि अधोलोक वासी हुए अर्थात् नरक गए।

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श्री नमिनाथ जी(SHRI Nami NATH JI)

   ( उत्तर पुराण के अनुसार) 
श्री नमिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी इक्कीसवें तीर्थंकर है। इन्होंने राजा सिद्धार्थ की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। ये अपराजित नामक अनुत्तर विमान से चयकर भरतक्षेत्र के बंग देश की मिथिला नगरी में इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्री राजा विजय की महारानी वप्पिला के गर्भ में आश्विन कृष्ण द्वितीया को अवतरित हुए थे। इंद्रों ने गर्भ कल्याणक महोत्सव संपन्न किया।
 आषाढ़ कृष्ण दशमी को भगवान् का जन्म हुआ था। भगवान् मुनिसुव्रत स्वामी के मोक्ष जाने के बाद 6000000 वर्ष व्यतीत होने पर श्री नमिनाथ भगवान्  का जन्म हुआ।
 इनकी आयु 10000 वर्ष थी, शरीर 15 धनुष ऊंचा था,शरीर की कान्ति स्वर्ण सदृश थी। कुमार काल 2500 वर्ष का था। राज्यावस्था में 5000 वर्ष व्यतीत होने पर एक बार भगवान् वन विहार को गए, वहां दो देवों से पूर्व विदेह के अपराजित नामक तीर्थंकर के विषय में सुनकर वे अपने तथा  उन अपराजित तीर्थंकर के पूर्व भव का चिंतन करने लगे और इस प्रकार वैराग्य के संयोग से वे आत्मबोध को प्राप्त हुए। लोकांतिक देवों ने उनकी पूजा की। भगवान् 'उत्तरकुरु' नाम की पालकी में सवार होकर चैत्र वन में आषाढ़ कृष्ण दशमी के दिन 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। तभी उन्हें मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो गया। वीरपुर के राजा दत्त ने भगवान् को आहार दान दिया। इनका छद्मस्थ काल 9 वर्ष का था। इन्होंने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को वकुल वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया।
 भगवान् के समवशरण में सुप्रभार्य को आदि लेकर 17 गणधर थे। 450 पूर्वधारी, 12600 शिक्षक, 1600 अवधिज्ञानी, 1600 केवलज्ञानी, 1500 विक्रियाऋद्धि -धारी, 1250 मन:पर्ययज्ञानी तथा 1000 वादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर मुनियों की संख्या 20000 थी।
 मंगिनी को आदि लेकर 45000 आर्यिकाएं थीं। 100000 श्रावक तथा 300000 श्राविकाएं थीं और असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे।
 अनेक देशों में विहार करते हुए भगवान्  आयु का एक माह शेष रहने पर सम्मेदाचल पहुंचे, वहां 1000 मुनियों के साथ प्रतिमा योग को धारण किया तथा वैशाख कृष्ण चतुर्दशी को अश्विन नक्षत्र में मोक्ष को प्राप्त किया। भगवान् के तीर्थ काल में जयसेन नामक चक्रवर्ती हुए, उन्होंने संयम ग्रहण किया तथा जयंत विमान में अहमिन्द्र हुए।

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श्री नेमिनाथ जी(SHRI Nemi NATH JI)

  (उत्तर पुराण के अनुसार)
 श्री नेमिनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी के बाइसवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा सुप्रतिष्ठ की पर्याय में तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंध किया था। ये जयन्त विमान से चयकर हरिवंशीय काश्यपगोत्री राजा समुद्रविजय की महारानी शिवादेवी के गर्भ में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को अवतरित हुए थे।
 श्रावण शुक्ला षष्ठी को ब्रह्म योग में भगवान् का जन्म हुआ था।  भगवान् नमिनाथ के मोक्ष जाने के बाद 500000 वर्ष व्यतीत होने पर इनका जन्म हुआ था। उनकी आयु इसी अंतराल में शामिल थी। इनकी आयु 1000 वर्ष की थी। शरीर 10 धनुष ऊंचा था।
 श्री कृष्ण द्वारा बंधवाए गए पशुओं का दीन स्वर सुनकर भगवान् को वैराग्य हो गया और वे विरक्त होकर विवाह स्थल पर  न जाकर घर लौट गए। उसी समय लौकांतिक देवों ने भगवान् के विचारों का समर्थन किया। कुमार काल के 300 वर्ष व्यतीत होने पर भगवान् ने संयम को धारण किया। भगवान् 'देवकुरु' नाम की पालकी में बैठकर सहस्राम वन में पहुंचे और श्रावण शुक्ल षष्ठी के दिन तेला का नियम लेकर 1000 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। राजमती भी उनके पीछे- पीछे तपश्चरण के लिए चली गई।
 भगवान् को द्वारावती के राजा वरदत्त ने नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर आहार दान दिया व पंचाश्चर्य प्राप्त किए। छद्मस्थ अवस्था में 55 दिन व्यतीत होने पर रैवतक (गिरनार) पर्वत पर बांस के वृक्ष के नीचे आसोज कृष्ण पड़वा के दिन केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इनके समवशरण में वरदत्त को आदि लेकर 11 गणधर थे। 400 पूर्वधारी, 11800 शिक्षक, 1503 अवधिज्ञानी, उतने ही अर्थात् 1503 केवलज्ञानी, 1100  विक्रियाऋद्धिधारी, 900 मन:पर्ययज्ञानी और 800 वादो थे। सब मिलाकर 18000 मुनिराज उनकी सभा में थे।
 राजमती को आदि लेकर 40000  आर्यिकाएं थीं। 100000 श्रावक तथा 300000 श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव-देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे। श्री नेमिनाथ भगवान् ने 699 वर्ष 9 माह 4 दिन विहार किया और अंत में गिरनार पर्वत पर आकर 533 मुनियों के साथ एक माह का प्रतिमा योग धारण किया तथा आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को चित्रा नक्षत्र में मोक्ष प्राप्त किया। इनके समय में 'श्रीकृष्ण' नाम के नारायण हुए, जो नरक गए। 'जरासंध' नाम के प्रतिनारायण हुए, वे  भी नरक गए और नौवें बलभद्र हुए, जो स्वर्ग गए। इन्हीं के तीर्थ काल में 'ब्रह्म' नाम के बारहवें चक्रवर्ती हुए थे।

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श्री पार्श्वनाथ जी(SHRI Parshva NATH JI)

 ‌‌(उत्तर पुराण के अनुसार)
श्री पार्श्वनाथ भगवान् वर्तमान चौबीसी तेईसवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने महाराजा आनंद की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। ये प्राणत स्वर्ग से चयकर भरत क्षेत्र संबंधी काशी देश की बनारस नगरी के काश्यपगोत्री राजा विश्वसेन की महारानी ब्राह्मी के गर्भ में वैशाख कृष्ण द्वितीया के दिन अवतरित हुए।
 पौष कृष्ण एकादशी को भगवान् का जन्म हुआ। श्री नेमिनाथ भगवान् के बाद 83750 वर्ष बीत जाने पर भगवान् का जन्म हुआ था। इनकी आयु 100 वर्ष थी, वह इसी अंतराल में शामिल थी। शरीर 9 हाथ ऊंचा था। शरीर की कांति धान के छोटे पौधे के समान हरे रंग की थी। यह उग्र वंश में हुए थे।
 कुमार काल के 30 वर्ष व्यतीत होने पर अयोध्या से आए दूत के मुख से अयोध्या तथा भगवान् ऋषभदेव का वर्णन सुनकर अपने पूर्व भव का विचार करने लगे और आत्मबोध को प्राप्त हुए। लौकांतिक देवों ने भगवान् के वैराग्य की अनुमोदना की। भगवान् 'विमला' नाम की पालकी में सवार होकर अश्ववन में पहुंचे तथा तेला का नियम लेकर पौष कृष्ण एकादशी के दिन प्रातः काल सिद्ध भगवान् को नमस्कार कर 300 राजाओं के साथ दीक्षित हो गए। पारणा के दिन भगवान् गुल्मखेट नगर पहुंचे वहां 'धन्य' नाम के राजा ने उन्हें आहार दान दिया। भगवान् का छद्मस्थ काल 6 माह का था।
चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इनके समवशरण में स्वयंभू को आदि लेकर 10 गणधर थे। 350 पूर्वधारी, 10900 शिक्षक, 1400 अवधिज्ञानी, 1000 केवलज्ञानी, 1000 विक्रियाऋद्धिधारी 750 मन:पर्ययज्ञानी तथा 600 वादी थे, सब मिलाकर 16000 मुनि थे।
 सुलोचना को आदि लेकर 36000 आर्यिकाएं थीं। 100000 श्रावक तथा 300000 श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव- देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे।
 धर्मोपदेश देते हुए भगवान् ने 5 माह कम 70 वर्ष तक विहार किया। आयु के एक माह शेष रहने पर भगवान् सम्मेदाचल पहुंचे, यहां के शिखर पर 36 मुनिराजों के साथ प्रतिमा योग धारण किया। श्रावण शुक्ला सप्तमी को मोक्ष प्राप्त किया।

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श्री महावीर जी(SHRI Mahaveer JI)

(उत्तर पुराण के अनुसार)
 श्री महावीर भगवान् वर्तमान चौबीसी के चौबीसवें तीर्थंकर हैं। इन्होंने राजा नंद की पर्याय में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। ये अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान से चयकर भरतक्षेत्र के विदेह देश की कुंडलपुर नगरी के राजा सिद्धार्थ की महारानी प्रियकारिणी के गर्भ से आषाढ़ शुक्ल षष्ठी को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में अवतरित हुए थे। इनके राजमहल का नाम 'नंद्यावर्त' था। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को भगवान् का जन्म हुआ था। श्री पार्श्वनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के 250 वर्ष बीतने पर इनका जन्म हुआ था, इनकी आयु इसी अंतराल में सम्मिलित थी। कुछ कम 72 वर्ष इनकी आयु थी। शरीर 7 हाथ ऊंचा था।
 कुमारकाल 30 वर्ष का था। आत्मबोध होने पर लौकांतिक देवों ने उनकी स्तुति की। भगवान 'चंद्रप्रभा' पालकी में सवार होकर षण्ड नाम के वन में पहुंचे, तेला का नियम लेकर मार्गशीर्ष वदी दशमी को संयम धारण किया। कूलग्राम नाम की नगरी में राजा कूल ने भगवान् को आहार दान दिया। इनका छद्मस्थ काल 12 वर्ष का था।जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के किनारे मनोहर वन  में वैशाख शुक्ल दशमी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। भगवान् के समवशरण में गौतमस्वामी को आदि लेकर 11 गणधर थे। 311 अंग व पूर्वों के धारी थे, 9900 शिक्षक, 1300 अवधिज्ञानी, 700 केवलज्ञानी, 900 विक्रियाऋद्धिधारी, 500 मन:पर्ययज्ञानी तथा 400 अनुत्तर वादी थे, इस प्रकार सब मिलाकर 14000 मुनियों की संख्या थी।
चंदना को आदि लेकर 36000 आर्यिकाएं थीं। 100000 श्रावक तथा 300000 श्राविकाएं थीं। असंख्यात देव-देवियां तथा संख्यात तिर्यंच थे। 
 धर्मोपदेश करते हुए भगवान् ने अनेक देशों में विहार किया तथा अंत में पावापुर  नगर पहुंचे, वहां कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र में रात्रि के अंतिम प्रहर में 1000 मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त किया। चतुर्थ काल के अंत में जब 3 वर्ष साड़े 8 माह शेष रह गए तब भगवान् को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री