Namo jinanam

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हस्तिनापुर(Hastinapur)

खेकड़ा से मेरठ 53 ‌( दिल्ली से 62) किलोमीटर है । मेरठ उत्तर रेलवे का प्रमुख स्टेशन है। यहां काफी संख्या में जैन रहते हैं तथा कई दर्शनीय जिन मंदिर हैं। मेरठ से 37 किलोमीटर दूर हस्तिनापुर है। दिल्ली व मेरठ से हस्तिनापुर के लिए बसें चलती हैं।
 महाभारत काल से यह नगरी कुरुप्रदेश की राजधानी बताई जाती है। कौरव- पांडव यहीं के थे। हस्तिनापुर ही वह तीर्थ है जहां इस युग के आदि तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव का विहार हुआ था। उन्होंने एक वर्ष के उपवास के बाद यहां पदार्पण किया, तब यहां के राजा श्रेयांस थे। उन्होंने भगवान् को इक्षुरस का आहार देकर पुण्य लाभ प्राप्त किया था। यह तिथि थी अक्षय तृतीया। तब से ही अक्षय तृतीया का पर्व संचालित हो गया और इस प्रकार श्रेयांश को दान के आद्य प्रवर्तक कहा जाने लगा। इस क्षेत्र में भगवान् आदिनाथ का समवसरण कई बार आया था। बाद में यहीं पर श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ तीर्थंकरों के गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान कल्याणक हुए थे। इन तीर्थंकरों ने  छ:खंड पृथ्वी की दिग्विजय करके चक्रवर्ती की विभूति पाई थी किंतु उसको तृणवत् समझ, उसका त्याग कर दिया और इस प्रकार वे धर्म चक्रवर्ती हुए। यह तीर्थ हमें त्याग धर्म की शिक्षा देता है। श्री मल्लिनाथ का समवसरण भी यहां आया था। कुछ विद्वानों के मतानुसार भगवान् पार्श्वनाथ का भी यहां पदार्पण हुआ था ।
बाली और उनके मंत्रियों द्वारा अकंपनाचार्य और 700 मुनियों पर यहीं उपसर्ग किया गया था। उस उपसर्ग को मुनि विष्णु कुमार ने वामन रूप धारण कर दूर किया था, तभी से रक्षाबंधन का पर्व प्रारंभ हुआ।
 यहां दिल्ली के  मुगलकालीन शाही खजांची और धर्मात्मा राजा हरसुखराय का बनवाया हुआ एक विशाल एवं भव्य जिनमंदिर है इसका निर्माण 1801 में हुआ था। इसके विशाल द्वार का निर्माण  राजा सुगनचंद ने कराया था। यहां तीनों भगवानों के ( जिनके कल्याणक यहां हुए थे ) चरणचिह्नों सहित  तीन नसियां हैं। भगवान् महावीर के २५००वें निर्वाण महोत्सव के उपलक्ष में यहां बाहुबली मंदिर, २४ तीर्थंकरों की टोंकें, जल- मंदिर, पांडुकशिला आदि का भी निर्माण हुआ है।  एक नहर की खुदाई के समय कुछ प्राचीन जैन मूर्तियां उपलब्ध हुई हैं।उत्तर प्रांतीय दिगंबर जैन गुरुकुल भी है।
 यहां कार्तिक आष्टाह्निका  पर्व पर विशाल मेला होता है। फाल्गुनी अष्टाह्निका और ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को भी मेले होते हैं।
 हस्तिनापुर के समीप ही एक गांव है- बहसूमा । यहां एक भव्य मंदिर है जिसमें दर्शनीय प्राचीन मूर्तियां है।

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वहलना( Vehelna)

वहलना अतिशय क्षेत्र है। यह मेरठ- मुजफ्फरनगर मार्ग पर मेरठ से ४३ किलोमीटर है। सड़क पर पार्श्वनाथ मार्ग लिखा है उस मार्ग पर लगभग एक १ किलोमीटर चलकर छोटा सा गांव है। इस स्थान का मुख्य आकर्षण यहां का जैन मंदिर है। मंदिर विशाल है और मंदिर के बाहर उत्तर की ओर पांडुक शिला विराजमान है। यहां प्रतिवर्ष २ अक्टूबर को मेला लगता है। यहां से मुजफ्फरनगर ५ किलोमीटर है। जो यात्री रेल या सार्वजनिक बस से यात्रा करते हैं, उनको मुजफ्फरनगर (मेरठ ४८ किलोमीटर है) पहुंचकर रिक्शा द्वारा वहलना जाना चाहिए। मुजफ्फरनगर में आवास आदि की सब सुविधाएं हैं।

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श्रीनगर(Sri Nagar)

मेरठ से मुरादाबाद जाना चाहिए। मुरादाबाद से नजीबाबाद पहुंचें। वहां से बस द्वारा कोटद्वार होते हुए श्रीनगर पहुंचा जा सकता है। नजीबाबाद से श्रीनगर १६० किलोमीटर है। ऋषिकेश से भी श्रीनगर पहुंचा जा सकता है। यहां से श्रीनगर १०७ किलोमीटर दूर है। अपनी भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक कारणों से श्रीनगर प्रमुख नगरों में गिना जाता रहा है। किसी समय यह पौढ़ी गढ़वाल की राजधानी था। श्रीनगर में अलकनंदा के तट पर जैन मंदिर स्थित है। वहां भगवान पार्श्वनाथ की चमत्कारी प्रतिमा है। इसके चमत्कारों से संबंद्ध अनेक किंवदंतियां है। १८९४ में श्रीनगर ध्वस्त हो गया था उस विनाश लीला से जैन मंदिर भी नहीं बच पाया था। हां, प्रतिमाएं  अवश्य सुरक्षित रह गई थीं। लाला प्रतापसिंह एवं लाला मनोहर लाल के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। श्रीनगर में ठहरने के लिए जैन धर्मशाला है।

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अहिक्षेत्र (Ahikshatra)

बदरीनाथ से पुनः मुरादाबाद लौटकर चंदौसी होते हुए आंवला स्टेशन पहुंचें। आंवला स्टेशन से रामनगर (जिला बरेली) केवल १८ किलोमीटर है। रामनगर ही अहिक्षेत्र है। आंवला स्टेशन से अहिक्षेत्र के लिए तांगे आदि मिलते हैं। बरेली व बदायूं से बस सेवा भी उपलब्ध रहती है।
 भगवान् पार्श्वनाथ कुमारावस्था में वाराणसी में गंगा तट पर घूम रहे थे उन्होंने कुछ तापसों को अग्नि जलाकर तप करते हुए देखा। अपने विदीप्त ज्ञान से उन्होंने जान लिया कि एक लकड़ी में सर्प युगल था। लकड़ी चीरने पर वह सर्पयुगल निकला। उन्हें मरणासन्न जान भगवान् ने उनके कान में णमोकार मंत्र पढ़ा। वह सर्प धरणेंद्र और सर्पिणी पद्मावती हुई।
 इस घटना के बाद भगवान् पार्श्वनाथ ने दीक्षा ली। तदुपरांत इस क्षेत्र में आकर तपस्या में लीन हुए। कमठ ने उन पर घोर उपसर्ग किया। वह तनिक भी विचलित नहीं हुए। अपने ध्यान में लीन रहे। धरणेंद्र और पद्मावती ने आकर अपने "नागफण मंडल रूप' छत्र लगाकर अपनी कृतज्ञता प्रकट की। उपसर्ग दूर हुआ। भगवान् को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। यहीं से उनके प्रथम धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ। उपसर्ग की अवस्था में सौ फण  का छत्र होने के कारण धरणेंद्र ने इस स्थान का नाम अहिच्छत्र या अहिक्षेत्र प्रकट किया। "महाभारत' में पांचाल जनपद का उल्लेख मिलता है। उसके दो भाग बताए गए हैं। उत्तर भाग की राजधानी अहिक्षेत्र और दक्षिण भाग की राजधानी कांपिल्य।  पहले पूरे पांचाल पर द्रुपद का राज्य था। द्रोणाचार्य ने उसे जीत लिया फिर दो भागों में विभाजित कर दिया। उत्तर पांचाल पर स्वयं राज्य करने लगे। दक्षिण पांचाल द्रुपद को दे दिया।
 यहां महाभारतकालीन एक किला भी बताया जाता है। यहां विस्तृत भू-भाग में यत्र तत्र प्राचीन खंडहर भी मिलते हैं। यहां कई शिलालेख और जैन मूर्तियां मिली हैं। यह क्षेत्र जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां जैन राजाओं का दीर्घ काल तक राज्य रहा है। राजा वसुपाल ने यहां एक सुंदर सहस्त्र कूट जिन मंदिर का निर्माण कराया था उसमें कसौटी के पाषाण की भगवान् पार्श्वनाथ की नौ हाथ ऊंची लेपदार प्रतिमा विराजमान की थी। आचार्य पात्र केशरी ने यहीं पर पद्मावती देवी द्वारा फण मंडप पर लिखित अनुमान के लक्षण पर अपनी शंका का निवारण किया था और जैन धर्म की दीक्षा ली थी। यह घटना राजा अवनिपाल के शासनकाल की है। राजा इस घटना से प्रभावित हुआ और उसने जैन धर्म धारण कर लिया था। जिस समय गिरिनार पर्वत पर भगवान् नेमिनाथ का निर्वाण कल्याणक मनाया गया था, उसी समय यहां के राजा ने भी निर्वाणोत्सव मनाया था। श्री अहिक्षेत्र के दर्शन से कृतज्ञता ज्ञापन और सत्य के पक्षपाती बनने की शिक्षा मिलती है।
 यहां एक प्राचीन शिखरबंद मंदिर है। इसमें एक वेदी "तिखालवाले बाबा' की कहलाती है। बाबा का बड़ा चमत्कार है। इस मूर्ति की बड़ी मान्यता है। अनेक लोग मनौती मनाने आते हैं।
 रामनगर गांव में एक विशाल दिगंबर जैन मंदिर है। इसमें छः वेदियों में भगवान् विराजमान है। यहां धर्मशालाएं भी है। प्रतिवर्ष चैत्र वदी अष्टमी से त्रयोदशी तक मेला होता है। अषाढ़ी अष्टाह्निका  पर्व में यात्रीगण आकर श्री सिद्धचक्र विधान करते हैं। यह उत्सव भी एक लघु मेले का रूप धारण कर लेता है।
 यहां पर एक कुएं के जल में विशेष गुण हैं। उस जल के पीने से अनेक रोग शांत हो जाते हैं। प्राचीन काल में समीपस्थ क्षेत्रों के राजा, नवाब आदि इस कुएं का जल मंगवाते थे। उत्तराभिधाना बावड़ी के जल में स्नान करने से कुष्ठ रोग दूर हो जाता है। यहां के वन से अनेक प्रकार की औषधियां प्राप्त होती हैं।

Our Experiences

  • हमने तीर्थंकरों को तो देखा नहीं है किंतु आचार्य श्री वसुनंदी जी गुरुवर हमारे लिए भगवान ही हैं।हे भगवन्! आपका हाथ सदैव हमारे सिर पर रहे।

    निकुंज जैन, दिल्ली
    सरक्षंक -अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, भारत(रजि.)

  • चित्रण क्या करूं उनका जिनका जीवन खुद एक विश्लेषण है, लाखों की भीड़ में बने वो पथ प्रदर्शक हैं,
    धारण कर वैराग्य, त्याग दिया जिसने संसार हैं,
    न राग, न द्वेष, कलह का करे जो तिरस्कार है,
     पूरी दुनिया करती जिन्हें शत शत नमस्कार है,
    वीर रथ पर चलने वाले वह हमारे गुरुदेव हैं,
    करता हूं मैं आपको नमोस्तु बारंबार,
    नमोस्तु गुरुवर। नमोस्तु गुरूवर।

  • मेरे गुरूवर मेरे प्रभु  १०८  आचार्य वसुनन्दी जी को नमन। आचार्य परमेष्ठी आप संयमी,रत्नत्रय से युक्त, क्षमाभाव धारक ,धर्मोंपदेष्टा ,महान चिन्तक ,नाना विद्याओं में निपुण विविध भाषाओं के ज्ञाता हैं। देश समाज के सर्व हितकारी ,मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करने में पूर्ण सक्षम हे गुरूवर आपका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बनाए रखें ऐसी प्रार्थना है।   नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु।

    रमेशगर्ग जैन  (रिटायर आई.पी.एस. अधिकारी)

  • मेरे जीवन के  क्षण- क्षण को, शरीर के रोम -रोम को प्रत्येक शब्द, विचार एवं भाव को वात्सल्य पूर्वक आशीर्वाद से प्रभावित करने वाले गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन।

    डॉ. नीरज जैन

  • Aacharya Shri Vasunandi muniraj is a leading Digamber ascetic saint who is spreading his fragrance with his deep knowledge of Jain religion and writings. He is the guiding light and lifeline for all his followers. He shows us simple ways of living life leading to enlightenment.

    Dr. Veena Jain

  • वात्सल्य रत्नाकर मम् गुरु परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज हम सभी आपके असीम वात्सल्य से उपकृत है हम सभी के ऊपर आपके वात्सल्य की अनुपम कृपा बरसती रहे
    गुरु चरण चच्यरीक
    पं.मनोज कुमार शास्त्री