
तत्वार्थ सूत्र (Tatvarth Sutra)
आचार्य भगवन् श्री उमास्वामी द्वारा रचित प्रस्तुत ग्रंथ 357 सूत्रों से युक्त है, जिसके माध्यम से रचनाकार ने चारों अनुयोगों का समावेश कुल 10 अध्यायों में किया। सूत्रों का हिंदी अर्थ परम पूज्य भारत गौरव आचार्य श्री देशभूषण जी मुनिराज द्वारा सरल व ज्ञानवर्द्धक रूप से है। तत्त्वार्थ सूत्र जैन दर्शन का एक ऐसा प्रतिनिधि स्वरूप मूल ग्रंथ है जिसका गुरुमुख से अध्ययन करने पर जैन धर्म की आत्मा से साक्षात्कार हो जाता है।


कर्म प्रकृति (Karm Prakriti)
सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य श्री अभयचंद्र जी द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "कर्म प्रकृति" में बंध आदि विषयों का वर्णन सरल, सुबोध और सहज भाषा में किया गया है। प्रारंभिक अध्येता या विद्यार्थी विशेष सहयोग के बिना भी इसमें स्वयं प्रवेश पा सकते हैं। संस्कृत भाषा का साधारण जानकार भव्य जीव भी इस कृति से जैन धर्म के सिद्धांतों की पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर सकता है।

चार श्रावकाचार (char shravakachar)
प्रस्तुत कृति "चार श्रावकाचार" के नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसमें 4 श्रावकाचारों को सम्मिलित किया गया है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार, चारित्रसार गत श्रावकाचार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा गत श्रावकाचार और वसुनन्दी श्रावकाचार। इन 4 श्रावकाचारों का भव्य प्राणियों को निश्चित ही स्वाध्याय करना चाहिए एवं श्रावकपने को अंगीकार करने हेतु स्वीकार करना चाहिए। ये कृति श्रावकों के लिए बहुपयोगी लघु काय में प्रस्तुत की है।

गुण रत्नाकर (रत्न करण्ड श्रावकाचार) (Gunn Ratnakar)
प्रस्तुत ग्रंथ "गुण रत्नाकर (रत्नकरण्ड श्रावकाचार)" लगभग 2000 साल पहले आचार्य श्री समंतभद्र स्वामी जी द्वारा रचित है जो श्रावकों की चर्या का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में कुल 150 श्लोकों के माध्यम से संस्कृत को सरलता से हिंदी में समझाते हुए श्रावकों को अनुकूल चर्या का पालन करने का संकेत किया है। सुप्रसिद्ध रत्नकरण्ड श्रावकाचार की बहुपयोगिता को देखते हुए ग्रंथ का प्रकाशन सरल अर्थ के साथ किया गया है।

पंचरत्न (pancharatn)
प्रस्तुत कृति "पंचरत्न" में प्रश्नोत्तर रत्नमालिका, मृत्यु महोत्सव, परमानंद स्तोत्र, ज्ञानसार एवं लघुशांति सुधा सिंधु- इन 5 लघु काय ग्रंथों को संग्रह किया गया है, इससे इसका पंचरत्न नाम सार्थक होता है। अत्यल्प काय ग्रंथ, महा सार गर्भित अर्थ को बताने वाले हैं जिनका अन्वयार्थ और अनुवाद बालकों के लिए भी सहजगम्य है।


वसुऋद्धि (vasuriddhi)
आचार्य भगवन् श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा संकलित एवं संपादित इस लघु काय कृति "वसुऋद्धि" में आचार्य श्री शिवकोटी जी मुनिराज द्वारा रचित 'रत्नमाला', आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी द्वारा रचित 'पूज्यपाद श्रावकाचार' व 'इष्टोपदेश', आचार्य श्री योगिन्दु देव जी द्वारा रचित 'ज्ञानांकुश', आचार्य श्री विशाल कीर्ति जी द्वारा रचित 'वैराग्यमणिमाला', आचार्य श्री अकलंक देव जी द्वारा रचित 'स्वरूप संबोधन', आचार्य श्री नेमिचन्द जी सूरि जी द्वारा रचित 'लघु द्रव्य संग्रह' तथा श्री प्रभाचंद्राचार्य जी द्वारा रचित 'अर्हत प्रवचनम्' अर्थ सहित समाहित हैं। कुछ उपलब्ध कुछ अनुपलब्ध दुर्लभ कृतियों का समावेश इस कृति की महत्ता को बढ़ाता है।

समाधिसार (samaadhisaar)
श्री सोमसेनाचार्य कृत "समाधि सार" नामक ग्रंथ में 200 श्लोक निबद्ध हैं।यह ग्रंथ वस्तुत: समाधि साधना हेतु सारभूत ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया है। ग्रंथ सरल, सुबोध और सारगर्भित है। समाधि की साधना प्रत्येक भव्य का परम और चरम लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने में यह ग्रंथ सहायक है।

भावत्रयफलप्रदर्शी (Bhavatrayfalpradarshi)
प्रस्तुत ग्रंथ "भावत्रयफलप्रदर्शी" में विस्तार के साथ अशुभोपयोग से प्राप्त होने वाले विविध प्रकार के दुखों का वर्णन किया है।
किस प्रकर का कार्य करने से कौन से कर्म का बंध होता है।
वर्तमान काल में प्रत्यक्ष ज्ञानी नहीं हैं किंतु उनकी वाणी हमारे पास है जिसके माध्यम से जाना जा सकता है कि जीव ने पूर्व भव में अच्छे कर्म किए हैं या बुरे कर्म? इसका वर्णन ग्रंथराज में विस्तार के साथ लिखा है।
कर्नाटक में जन्मे आचार्य श्री कुंथुसागर जी ने संस्कृत भाषा में विपुल मात्रा में जैन वांग्मय की रचना की है।

धम्म रसायन (dhamma rasayan)
प्रस्तुत कृति "धम्म रसायणं" में आत्मा को परमात्मा बनाने की रासायनिक प्रक्रिया बताई है। प्रस्तुत रचना संसार जीवों पर एक स्तुत्य उपकार है तथा इस ग्रंथ का भाषानुवाद आचार्य भरत सागर जी ने किया है। आत्मा की अवस्था कैसे प्राप्त हो इस पर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत ग्रन्थ में मूल गाथा उसका अन्वयार्थ और हिंदी अनुवाद सरल व सहज ही दृष्टिगोचर होते हुए प्रत्येक जीव के ज्ञान को विकसित करने के साथ -साथ आत्म शुद्धि के उपाय करने की भावना को जागृत करेगा , अतः इसका स्वाध्याय अवश्य करणीय है।

तच्च वियारो सारो (tacch viyaro Saro)
प्रस्तुत ग्रंथ "तच्च वियारो सारो" में 295 गाथाओं के माध्यम से णमोकार महात्म्य ,धर्म, सम्यक्त्व आदि के फल को बताया गया है। काव्य सरल व परोपकार की भावना से युक्त हैं। प्रस्तुत कृति प्राचीन आचार्य श्री वसुनंदी जी की अनमोल व अनुपम कृति है। जिसका सरल व बोधप्रद अन्वयार्थ सभी भव्य जीवों के लिए ज्ञान वृद्धि व आत्मरसामृत के पान कराने में पूर्ण सक्षम है। जिसका स्वाध्याय सभी के करने योग्य है।