

कल्याणी (kalyani)
आचार्य श्री वसुनन्दी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "कल्याणी" में आगम, आध्यात्म, सिद्धांत, चरणानुयोग, रीति-रिवाज, सामाजिक नीतियाँ और मानवीय कर्तव्यों के सरल पद्य हैं। प्रत्येक पद्य के अंत में कल्याणी शब्द का प्रयोग हुआ है। प्रस्तुत कृति में पद्य की योजना अपने आप में सर्वोपरी है, मोदक की तरह से सुखद और आनंद प्रदायक है।
इस कृति को पूज्य श्री ने मात्र एक ही दिन रात में सृजन किया है जो हर वर्ग के व्यक्ति के लिए उसकी योग्यतानुसार ग्राह्य है।

अक्षरातीत अक्षर (Ksharateet Akshar)
आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज द्वारा रचित प्रस्तुत कृति "क्षरातीत अक्षर" में कुछ तुकोकांत क्षणिकाएं हैं। इन क्षणिकाओं से भी प्रबुद्ध वर्ग लाभान्वित हो सकता है। इन क्षणिकाओं में क्षणिक जीवन की सत्यता का निवास है। ये कृति कविगणों के लिए अति उपयोगी है या जो कवि बनने की भावना रखते हैं उनके लिए अत्यंत सहयोगी कृति है।